सुप्रभात बालमित्रों!
30 दिसंबर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 30 दिसंबर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
“मौन और आत्म-नियंत्रण ही अहिंसा है।”
"Silence and self-control is non-violence."
अहिंसा केवल दूसरों पर हिंसा न करने का नाम नहीं है, बल्कि स्वयं को नियंत्रित करते हुए अपने विचारों, वाणी और व्यवहार को भी शांत और सकारात्मक बनाना अहिंसा का वास्तविक रूप है। जब मन उत्तेजित होता है तो क्रोध, कटु वचन और गलत कर्म जन्म लेते हैं, जो सीधी या अप्रत्यक्ष हिंसा का रूप बन जाते हैं। ऐसे में मौन हमें भावनाओं को शांत रखने का अवसर देता है और आत्म-नियंत्रण हमें किसी भी परिस्थिति में संतुलित निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है। जो व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण रखता है वह किसी को आहत नहीं करता—न शब्दों से, न विचारों से और न कर्मों से। मौन हमें सोचने, समझने और परिस्थितियों को सही दृष्टिकोण से देखने की क्षमता देता है। इसी कारण, सच्ची अहिंसा तब संभव होती है जब हम पहले अपने भीतर की अशांति को शांत करते हुए आत्म-नियंत्रित जीवन अपनाते हैं।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: Grudge : ग्रज : द्वेष, मन में बैर रखना, रंजिश।
वाक्य प्रयोग : We should not hold a grudge against anyone. हमें किसी के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए।
उत्तर : किताब
v अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 30 दिसंबर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1906 – ढाका तत्कालीन ब्रिटिश भारत में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना था। नवाब सलीमुल्लाह खान के नेतृत्व में गठित यह लीग बाद में पाकिस्तान आंदोलन का प्रमुख केंद्र बनी।
- 1922 – रूस, यूक्रेन, बेलारूस तथा ट्रांसकाकेशिया ने मिलकर सोवियत समाजवादी गणराज्यों का संघ USSR का गठन किया, जिसकी राजधानी मॉस्को बनी। यह दुनिया का पहला साम्यवादी राज्य था जो 1991 तक चला।
- 1943 – स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर अंडमान द्वीप में आजाद हिंद फौज के झंडे को फहराया, जो जापानी सहयोग से ब्रिटिश शासन से मुक्त भारतीय भूमि पर पहली बार तिरंगा लहराने का प्रतीक बना।
- 1971 – भारत के प्रमुख वैज्ञानिक तथा अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई का त्रिवेंद्रम केरल में निधन हो गया। उन्होंने 86 शोध पत्र लिखे, 40 संस्थान स्थापित किए तथा 1966 में पद्म भूषण से सम्मानित हुए।
- 1975 – हिंदी के प्रसिद्ध कवि तथा ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार का भोपाल में निधन हो गया। उनकी रचनाएँ जैसे "हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए" सामाजिक विद्रोह का प्रतीक बनीं।
v अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “हिंदी के प्रसिद्ध कवि तथा ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार” के बारे में।
कवि दुष्यंत कुमार का जन्म 1 सितंबर 1933 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. की उपाधि प्राप्त की और आधुनिक हिन्दी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
उनका साहित्यिक योगदान विशेष रूप से हिन्दी ग़ज़ल लेखन में रहा — ग़ज़ल संग्रह जैसे साए में धूप ने हिन्दी ग़ज़ल को जन-मुखी भाषा में पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अन्य प्रमुख कृति-संग्रह हैं सूर्य का स्वागत, आवाज़ों के घेरे तथा जलते हुए वन का वसंत।
दुष्यंत कुमार की कविताएँ और ग़ज़लें आम आदमी की पीड़ा, सामाजिक अन्याय, राजनीतिक चेतना और परिवर्तन की चाह को अभिव्यक्त करती थीं। उदाहरण के तौर पर उनकी पंक्ति — “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।” — इस भाव-भूमि का प्रतीक है, जहाँ उन्होंने बड़े-बड़े शायरों की भाषा से हटकर सरल, तीव्र और प्रभावशाली शब्दों में आज की हकीकत को खुलकर लिखा।
दुष्यंत कुमार ने अल्पायु केवल 42 वर्ष में साहित्य-जगत को एक अमिट छाप छोड़ते हुए विदा ली, लेकिन उनकी कविताएँ आज भी जन-मानस में गूंज रही हैं। साहित्य में उनकी विरासत ऐसे दौर में भी प्रासंगिक बनी हुई है जहाँ बदलाव की तीव्र चाह है। उन्होंने यह दिखाया कि कविता केवल सौंदर्य-प्रसाद का माध्यम नहीं बल्कि चेतना-उपजाने का जरिया भी हो सकती है।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे को मनाये 30 दिसंबर को मनाये जाने वाले “विक्रम साराभाई की पुण्यतिथि” के बारे में:
हर वर्ष 30 दिसंबर को भारत उस महान वैज्ञानिक, दूरदर्शी और “भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक” डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है। 1971 की इसी रात तिरुवनंतपुरम में मात्र 52 वर्ष की आयु में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। वे थुम्बा रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन के निरीक्षण से लौटे थे और अगले ही दिन भारत के पहले उपग्रह लॉन्च की तैयारी कर रहे थे, किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। उन्होंने 1947 में अहमदाबाद में फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी PRL की स्थापना की, तथा आगे चलकर इसरो, भारतीय प्रबंधन संस्थान IIM अहमदाबाद, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था—“हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि देश के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार पहुँचाने के लिए है।” आज जब भारत चंद्रयान, मंगलयान और गगनयान जैसी उपलब्धियों से दुनिया में अपनी पहचान दर्ज करा रहा है, तब हर सफलता में साराभाई की दूरदृष्टि और सपनों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। 30 दिसंबर कोई सार्वजनिक अवकाश नहीं, पर यह हर भारतीय के लिए गर्व, कृतज्ञता और प्रेरणा का दिन है। उनकी पुण्यतिथि पर हम केवल श्रद्धांजलि ही नहीं, बल्कि उनके सपनों को साकार करने का संकल्प भी लेते हैं—कि भारत का अंतरिक्ष मिशन सदैव मानवता की सेवा के लिए आगे बढ़ता रहे।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “सफल जीवन की सच्ची सीख”
आचार्य बहुश्रुति के आश्रम में तीन शिष्य शिक्षा पूर्ण कर विदा लेने को तैयार थे। आचार्य ने अंतिम परीक्षा के लिए सात दिन बाद आने को कहा। निर्दिष्ट दिन जब तीनों कुटिया पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि प्रवेश द्वार पर काँटे बिखरे पड़े हैं। सावधानी रखने पर भी तीनों के पैरों में काँटे चुभ गए। प्रथम शिष्य ने अपने पैरों से काँटे निकालकर कुटिया में प्रवेश कर लिया। दूसरा शिष्य किनारे बैठ गया और विचार करने लगा, जबकि तीसरे शिष्य ने बिना देर किए झाड़ू उठाई और कुटिया के सामने बिखरे सभी काँटों को साफ कर दिया, ताकि आगे कोई और चोटिल न हो। आचार्य ने पहले और दूसरे शिष्य को आश्रम में ही रोक लिया और तीसरे को आशीर्वाद देकर विदा किया। उन्होंने कहा—“तुम्हारी शिक्षा अब पूर्ण हुई, क्योंकि जब तक ज्ञान आचरण में न उतर जाए, तब तक शिक्षा अधूरी है।” यह प्रसंग आज के शिक्षण-प्रणाली के लिए गहरी सीख देता है। अक्सर विद्यालयों में पाठ्यक्रम खत्म होते ही विद्यार्थियों को परीक्षा योग्य मान लिया जाता है। अधूरे ज्ञान और परीक्षकों की उदारता से विद्यार्थी परीक्षा तो पास कर लेते हैं, पर जीवन की कठिन चुनौतियों में असफल हो जाते हैं। क्योंकि सच्ची शिक्षा वही है, जो व्यवहार में उतरकर समाज और स्वयं के जीवन में सुधार ला सके। अतः शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक या प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और कर्मशीलता का विकास होना चाहिए—यही सफल जीवन की सच्ची सीख है।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







