सुप्रभात बालमित्रों!
31 दिसंबर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 31 दिसंबर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
“प्रतिस्पर्धियों को भूल जाएं, और केवल अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाए।”
"Forget about competitors, just focus on your goals."
सफलता प्राप्त करने के लिए सबसे आवश्यक है कि हम अपनी ऊर्जा दूसरों से तुलना करने में नहीं, बल्कि अपने लक्ष्य को पाने में लगाएं। जब हमारा ध्यान प्रतिस्पर्धियों पर होता है, तो मन विचलित होने लगता है और ईर्ष्या, चिंता तथा हताशा जैसी नकारात्मक भावनाएँ हमारे आत्मविश्वास को कमजोर कर देती हैं। इसके विपरीत, यदि हमारी नजर केवल अपनी मंज़िल पर केंद्रित हो, तो हमारी मेहनत और विचार एक सही दिशा में आगे बढ़ते हैं। असली प्रतिस्पर्धा हमेशा अपने आप से होती है—आज हम कल से बेहतर बनें, यही सबसे बड़ी सफलता है। ठीक उसी तरह जैसे दौड़ का धावक यदि पीछे मुड़कर दूसरों को देखे, तो उसकी गति धीमी पड़ जाती है; परंतु यदि वह फिनिश लाइन पर ध्यान रखे, तो अपनी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ता है। इसलिए दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखें, सपनों पर विश्वास करें और निरंतर प्रयास करते रहें। एकाग्र मन ही विजेता बनता है और लक्ष्य तक पहुँचता है।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: IDENTICAL आइडेंटिकल : समान, एक जैसे, पूरी तरह समरूप
वाक्य प्रयोग: These two shirts are identical in size and color. ये दोनों शर्ट आकार और रंग में बिल्कुल समान हैं।
उत्तर : ओस
v अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 31 दिसंबर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1600 – ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने शाही फरमान जारी कर ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की, जो पूर्वी एशिया एवं भारत के साथ व्यापार के लिए बनाई गई तथा ब्रिटिश उपनिवेशवाद की नींव रखी।
- 1781 – अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के बाद फिलाडेल्फिया में बैंक ऑफ नॉर्थ अमेरिका की स्थापना हुई, जो संयुक्त राज्य अमेरिका का पहला राष्ट्रीय बैंक था तथा संघीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला कदम था।
- 1802 – तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षण में आ गए तथा बक्सर संधि पर हस्ताक्षर किए, जिससे मराठा शक्ति कमजोर हुई।
- 1929 – लाहौर में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की घोषणा की गई तथा जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष चुना गया।
- 1945 – संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणापत्र UN Charter सभी 51 मूल सदस्य देशों द्वारा सत्यापित हो गया तथा संगठन औपचारिक रूप से स्थापित हुआ।
- 1949 – विश्व के 18 देशों ने इंडोनेशिया गणराज्य को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में आधिकारिक मान्यता दी, जो डच उपनिवेशवाद के समाप्ति का प्रतीक था।
- 1984 – इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने 40 वर्ष की आयु में भारत के सातवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली तथा कांग्रेस को लोकसभा में रिकॉर्ड 414 सीटें दिलाईं।
v अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे आधुनिक भारत के शिल्पकार “राजीव गांधी” के बारे में।
31 दिसंबर 1984 को 40 वर्ष की आयु में भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने देश को इक्कीसवीं सदी में ले जाने का सपना देखा और इसे साकार करने के लिए निर्णायक कदम उठाए। उन्होंने कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाकर भारत में एक डिजिटल क्रांति की नींव रखी; उन्होंने सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स C-DOT की स्थापना की और सॉफ्टवेयर निर्यात नीति लाए, जिसकी बदौलत आज भारत एक आईटी महाशक्ति है। उन्होंने दूरसंचार दरों में कमी की और ग्रामीण भारत तक एसटीडी-पीसीओ STD-PCO की सुविधा पहुँचाई। शिक्षा के क्षेत्र में, उन्होंने 1986 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की, जिसमें स्कूलों में पहली बार कंप्यूटर शिक्षा अनिवार्य हुई। उनका सबसे क्रांतिकारी कदम जवाहर नवोदय विद्यालय की शुरुआत था, जिसने ग्रामीण बच्चों को मुफ्त, उच्च-गुणवत्ता वाली आवासीय शिक्षा प्रदान कर लाखों गरीब प्रतिभाओं के लिए IIT-IAS बनने का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए 64वाँ संविधान संशोधन बिल लाकर लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। 21 मई 1991 में एक आतंकी हमले में उनकी मृत्यु हो गई, पर हर नवोदय विद्यालय, हर सॉफ्टवेयर इंजीनियर, और हर गाँव का टेलीफोन आज भी उनके दूरदर्शी सपने का जीता-जागता प्रमाण है, जो उन्हें आधुनिक भारत के शिल्पकारों में से एक बनाता है।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 31 दिसंबर को मनाये जाने वाले ‘नए साल की पूर्व संध्या' के बारे में:
नए साल की पूर्व संध्या, जिसे “न्यू ईयर ईव” कहा जाता है, उत्साह, उल्लास और उम्मीदों से भरा हुआ विशेष अवसर होता है। यह समय बीते हुए वर्ष की यादों को संजोने और नए वर्ष का स्वागत नई आशाओं तथा संकल्पों के साथ करने का होता है। भारत ही नहीं, पूरे विश्व में इस दिन का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। घरों, बाजारों और सड़कों को रोशनी और सजावट से जगमगाया जाता है, वहीं लोग अपने परिवार और मित्रों के साथ मिलकर खुशियाँ बाँटते हैं। जैसे-जैसे रात के बारह बजे का समय नज़दीक आता है, काउंटडाउन शुरू हो जाता है और एक नई उमंग मन में जगमगाने लगती है। आतिशबाजी, संगीत और शुभकामनाओं की गूंज वातावरण को आनंदमय बना देती है। यह अवसर हमें यह संदेश देता है कि हर अंत एक नई शुरुआत का द्वार होता है। इसलिए पुराने वर्ष की कमियों और परेशानियों को पीछे छोड़ते हुए लोग नए वर्ष के लिए अपने नए लक्ष्यों, सपनों और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं। नववर्ष का स्वागत जीवन में प्रेम, एकता और उत्साह से आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “हम गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं?”
एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। उन्होंने अचानक शिष्यों से प्रश्न पूछा— “जब दो लोग एक-दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो वे जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?” शिष्यों ने कुछ देर सोचकर उत्तर दिया— “क्योंकि उस समय हम अपनी शांति खो देते हैं, इसलिए चिल्लाने लगते हैं।” संत मुस्कुराए और बोले— “लेकिन जब दोनों ही व्यक्ति एक-दूसरे के पास होते हैं, तो धीमी आवाज में भी तो बात कर सकते हैं। फिर चिल्लाने की जरूरत क्यों पड़ती है?” अब शिष्य असमंजस में थे। संत ने स्वयं उत्तर देना शुरू किया— “जब लोग एक-दूसरे से गुस्सा होते हैं तो उनके दिलों के बीच दूरी बढ़ जाती है। यह दूरी इतनी बढ़ जाती है कि आवाज को उस दिल तक पहुँचाने के लिए उसे तेज करना पड़ता है। जितनी ज्यादा दूरी, उतनी ही ज्यादा चीख-पुकार। इसलिए गुस्से में लोग चिल्लाते हैं।” संत आगे बोले— “लेकिन जब दो लोगों में प्रेम होता है, उनके दिल करीब होते हैं। तब वे धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि आवाज को दूर तक नहीं जाना पड़ता। और जब प्रेम बहुत गहरा होता है, तो फुसफुसाकर भी बात समझ आ जाती है। प्रेम की चरम सीमा में तो आँखें ही बातें करने लगती हैं, शब्दों की भी जरूरत नहीं रहती।” संत ने शिष्यों को सीख देते हुए कहा— “इसलिए, जब भी गुस्सा आए या बहस हो, तो दिलों की दूरी न बढ़ने दें। शांत मन से और धीमी आवाज में बात करें। कहीं ऐसा न हो कि दूरियाँ इतनी अधिक हो जाएँ कि फिर लौटना मुश्किल हो जाए।”
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







