सुप्रभात बालमित्रों!
3 दिसंबर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 3 दिसंबर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
"शिक्षा का ध्येय है एक खाली दिमाग को खुले दिमाग में बदलना"
"Education's purpose is to replace an empty mind with an open one."
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल दिमाग में जानकारी भरना नहीं, बल्कि सोचने की क्षमता और दृष्टिकोण को व्यापक बनाना है। शिक्षा हमें तार्किक, विश्लेषणात्मक और रचनात्मक रूप से सोचने की शक्ति देती है। यह हमें सही और गलत में अंतर करना, प्रश्न पूछना और नए विचारों को स्वीकार करने की समझ प्रदान करती है। सच्ची शिक्षा वह है, जो हमें स्वतंत्र निर्णय लेने, आत्मनिर्भर बनने और समाज के प्रति जिम्मेदार बनाती है। जब हमारा मन खुला होता है, तब हम सीमित धारणाओं से ऊपर उठकर ज्ञान, सत्य और प्रगति की ओर बढ़ते हैं।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: Ambition: महत्वाकांक्षा: महत्वाकांक्षा का मतलब होता है – किसी बड़े लक्ष्य या सफलता को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा और उसके लिए निरंतर प्रयास करने की भावना। यह वह शक्ति है जो हमें आगे बढ़ने, बेहतर करने और जीवन में कुछ बड़ा हासिल करने के लिए प्रेरित करती है।
वाक्य प्रयोग: Ambition gives us a purpose and direction in life. महत्वाकांक्षा हमें जीवन में दिशा और उद्देश्य देती है।
उत्तर : अनानास
v अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 3 दिसंबर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1889: युवा भारतीय क्रांतिकारी खुदीराम बोस का जन्म मेदिनीपुर, बंगाल में हुआ, जिन्होंने मात्र 18 वर्ष की आयु में मुजफ्फरपुर बम कांड में भाग लिया तथा ब्रिटिश शासन के खिलाफ बलिदान दिया।
- 1884: स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म बिहार के जीरादेई में हुआ, जो संविधान सभा के अध्यक्ष रहे तथा 12 वर्ष तक राष्ट्रपति पद पर आसीन रहे।
- 1984: भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड संयंत्र से मिथाइल आइसोसायनेट गैस का रिसाव 2-3 दिसंबर की रात हुआ, जिसे विश्व की सबसे भयानक औद्योगिक त्रासदी माना जाता है तथा जिसमें हजारों लोग मारे गए और लाखों प्रभावित हुए।
- 1971: भारत-पाकिस्तान युद्ध की शुरुआत हुई, जब पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना ठिकानों पर हमला किया तथा भारत ने पूर्ण युद्ध की घोषणा की, जिससे बांग्लादेश का निर्माण हुआ।
- 1979: हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का निधन दिल्ली में हुआ, जो तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता भारतीय टीम के कप्तान थे।
- 1989: माल्टा शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव ने शीत युद्ध की समाप्ति की घोषणा की।
- 1992: संयुक्त राष्ट्र ने विश्व विकलांग दिवस घोषित किया, जिसका उद्देश्य विकलांगों के अधिकारों तथा कल्याण को बढ़ावा देना है।
- 2011: हिंदी सिनेमा के सदाबहार अभिनेता देव आनंद का निधन लंदन में हृदयाघात से हुआ।
v अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “xxx” के बारे में।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति, महान स्वतंत्रता सेनानी, सत्यनिष्ठ राजनेता और विनम्र व्यक्तित्व के प्रतीक थे। उनका जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सीवान जिले के जीरादेई नामक गाँव में हुआ था। वे बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की और बाद में वकालत के क्षेत्र में उच्च स्थान प्राप्त किया। लेकिन जब महात्मा गांधी ने उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन में जुड़ने का आह्वान किया, तो उन्होंने अपना सुनहरा करियर छोड़कर देश की सेवा को अपना धर्म बना लिया।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने कई सत्याग्रहों में भाग लिया और कई बार जेल भी गए। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक थे। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने भारतीय संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 26 जनवरी 1950 को जब भारत एक गणराज्य बना, तब उन्हें देश का पहला राष्ट्रपति बनने का सम्मान मिला। वे अपने सादगीपूर्ण जीवन, कर्तव्यनिष्ठा और निष्पक्ष निर्णयों के लिए प्रसिद्ध थे।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने लगभग 12 वर्षों तक राष्ट्रपति पद को गरिमा के साथ संभाला और राष्ट्र निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया। 1962 में उन्होंने सार्वजनिक जीवन से निवृत्ति ली और कुछ वर्षों बाद 28 फरवरी 1963 को उनका निधन हो गया। उनका जीवन हमें सादगी, सेवा और देशप्रेम का प्रेरणादायक संदेश देता है।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे को मनाये 3 दिसंबर को मनाये जाने वाले “विश्व विकलांग दिवस” के बारे में: के बारे में:
विश्व विकलांग दिवस International Day of Persons with Disabilities हर साल 3 दिसम्बर को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 3 दिसम्बर 1992 को विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देने, उन्हें समाज में समान अवसर प्रदान करने तथा उनके प्रति समाज में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से विश्व विकलांग दिवस के रूप में घोषित किया था। इस विशेष दिन का आयोजन विकलांग व्यक्तियों के जीवन को बेहतर बनाने और उन्हें समाज में समानता और सम्मान के साथ जीने के अवसर प्रदान करने के लिए किया जाता है। विश्व विकलांग दिवस समाज को यह सोचने पर प्रेरित करता है कि दिव्यांगजन भी हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा हैं और उन्हें शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा सामाजिक जीवन में बराबरी का हक मिलना चाहिए। यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि दिव्यांगजनों की सबसे बड़ी आवश्यकता सहानुभूति नहीं, बल्कि सम्मान और सहयोग है। आज के समय में विज्ञान और तकनीक ने दिव्यांगजनों के जीवन को सरल बनाने के लिए अनेक उपकरण और साधन उपलब्ध कराए हैं, जिनके माध्यम से वे अपने सपनों को साकार कर सकते हैं। इस अवसर पर विभिन्न स्कूलों, संस्थानों और सरकारी संगठनों द्वारा जागरूकता कार्यक्रम, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, खेलकूद प्रतियोगिताएँ और संवाद सत्र आयोजित किए जाते हैं। हम सभी का दायित्व है कि हम समाज में ऐसी संवेदनशीलता विकसित करें, जहाँ किसी को उसकी शारीरिक या मानसिक अलग क्षमताओं के कारण कमतर न आंका जाए।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “बड़ा बनो”
एक बार एक नवयुवक एक संत के पास पहुँचा और बोला, "महात्मा जी, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ। कृपया मुझे इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं।" संत बोले, "पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो।" युवक ने ऐसा ही किया। संत ने पूछा "इसका स्वाद कैसा लगा?"। युवक ने मुँह का पानी थूकते हुए कहा "बहुत ही खराब... एकदम खारा,"। संत मुस्कुराते हुए बोले, "अब अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक और लेलो और मेरे पीछे-पीछे आओ।" दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए। संत ने निर्देश दिया "चलो, अब इस नमक को पानी में डाल दो," । युवक ने ऐसा ही किया। संत बोले "अब इस झील का पानी पियो,"। युवक पानी पीने लगा... एक बार फिर संत ने पूछा, "बताओ इसका स्वाद कैसा है? क्या अभी भी तुम्हें यह खारा लग रहा है?" "नहीं, यह तो मीठा है, बहुत अच्छा है," युवक ने उत्तर दिया।
संत युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले, "जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं; न इससे कम न ज्यादा। जीवन में दुःख की मात्रा वही रहती है, बिलकुल वही। लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं। इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो... ग्लास मत बने रहो, झील बन जाओ।" यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में दुःख और समस्याएँ आती हैं, लेकिन हमें उन्हें अपने मन में बड़ा नहीं बनने देना चाहिए। हमें अपने मन और दृष्टिकोण को बड़ा और व्यापक बनाना चाहिए ताकि हम जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकें।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







