सुप्रभात बालमित्रों!
28 दिसंबर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 28 दिसंबर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
“यदि हम अपने विचारों को बदल सकें, तो हम दुनिया को बदल सकते हैं।”
"If we can change our thoughts, we can change the world."
इस कथन का अर्थ है कि हम जिस दृष्टि से दुनिया को देखते हैं, वह हमारे अपने विचारों से तय होता है। जब हम अपनी सोच को सकारात्मक, व्यापक और रचनात्मक दिशा में बदलते हैं, तो हमारा नजरिया, हमारा व्यवहार और अंततः हमारा जीवन बदल जाता है। यही बदली हुई सोच हमारे आसपास की दुनिया पर भी प्रभाव डालती है। मनुष्य का जीवन उसके विचारों का प्रतिफल होता है। सकारात्मक विचार हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, जबकि नकारात्मक विचार हमें पीछे रोकते हैं। आशा, आत्मविश्वास, समझ और सहानुभूति से भरी सोच व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है। जब हम अपने सोचने के तरीके को सुधारते हैं, तो हम अपनी परिस्थितियों, अपने संबंधों और पूरे वातावरण को बेहतर बना सकते हैं। इसलिए, अपनी सोच बदलना ही दुनिया बदलने का पहला और सबसे प्रभावी कदम है।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: HANDFUL : हैंडफुल : मुट्ठी भर, थोड़ी मात्रा, कम संख्या।
वाक्य प्रयोग: She added a handful of sugar to the dough. उसने आटे में मुट्ठी भर चीनी डाल दी।
उत्तर : समय
v अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 28 दिसंबर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
v 1885 – मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस INC की स्थापना हुई। ए.ओ. ह्यूम, दादाभाई नौरोजी तथा दिनशा वाचा जैसे संस्थापकों के नेतृत्व में पहला अधिवेशन शुरू हुआ तथा यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख मंच बना।
v 1896 – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा संगीतबद्ध 'वंदे मातरम' गीत को पहली बार गाया गया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1882 में 'आनंदमठ' उपन्यास में रचित यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना तथा 2003 में बीबीसी सर्वे में विश्व के शीर्ष 10 गीतों में दूसरे स्थान पर रहा।
v 1932 – रिलायंस इंडस्ट्रीज के संस्थापक धीरूभाई अंबानी का गुजरात के चोरवाड़ में जन्म हुआ। उन्होंने 1958 में रिलायंस की नींव रखी तथा भारतीय पूंजी बाजार में इक्विटी कल्चर का विकास किया।
v 1937 – टाटा समूह के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा का बॉम्बे तब मुंबई में जन्म हुआ। उन्होंने 1991-2012 तक टाटा चेयरमैन के रूप में समूह को वैश्विक बनाया तथा जगुआर लैंड रोवर एवं टेटली जैसे अधिग्रहण किए।
v 1950 – इंग्लैंड का पीक डिस्ट्रिक्ट यूरोप का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ। 1949 के नेशनल पार्क्स एक्ट के तहत स्थापित यह उद्यान डर्बीशायर तथा स्टैफोर्डशायर के पहाड़ी क्षेत्र को कवर करता है।
v 1977 – हिंदी साहित्य के छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत का इलाहाबाद वर्तमान प्रयागराज में निधन हुआ। उन्होंने प्रकृति-प्रधान काव्य जैसे 'पल्लव' एवं 'गुंजन' रचे तथा ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त किया।
v 2014 – अफगानिस्तान युद्ध का अमेरिकी लड़ाकू मिशन औपचारिक रूप से समाप्त हुआ। नाटो ने ISAF कमांड समाप्त किया तथा 13 वर्षीय संघर्ष में अमेरिकी सेनाओं को वापस बुलाया गया।
v अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे महान उद्योगपति पद्म विभूषण “रतन टाटा” के बारे में।
28 दिसंबर 1937 को जन्मे रतन टाटा भारत के सबसे सम्मानित उद्योगपतियों में से थे, उन्होंने 1991 से 2012 कुल 21 वर्षों तक–टाटा समूह का नेतृत्व किया। उनके दूरदर्शी नेतृत्व में टाटा समूह 13 अरब डॉलर से बढ़कर 100 अरब डॉलर का वैश्विक साम्राज्य बन गया। उनके काल में किए गए कोरस, जगुआर–लैंड रोवर और टेटली जैसे ऐतिहासिक अधिग्रहणों ने टाटा ब्रांड को विश्व-स्तर पर स्थापित किया। उन्होंने टीसीएस को विश्व की अग्रणी आईटी कंपनी के रूप में विकसित किया और टाटा नैनो को आम भारतीय की कार बनाने का सपना साकार किया। व्यवसाय से परे रतन टाटा अपने अद्वितीय परोपकार के लिए प्रसिद्ध रहे। टाटा ट्रस्ट्स के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण स्वास्थ्य, कैंसर अस्पतालों, शिक्षा और स्वच्छ जल परियोजनाओं में अरबों रुपये समर्पित किए। 26/11 मुंबई हमलों के बाद उन्होंने ताज होटल के प्रत्येक प्रभावित परिवार को आजीवन सहायता दी—यह उनकी मानवता का सर्वोच्च उदाहरण है। सादगी उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। वे अविवाहित रहे, मुंबई में अपने दो पालतू कुत्तों के साथ साधारण जीवन जीते थे और स्वयं विमान उड़ाने का शौक रखते थे। उन्हें पद्म विभूषण, KBE और ऑस्ट्रेलिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान सहित अनेक सम्मान मिले, परंतु उनका सबसे बड़ा पुरस्कार था करोड़ों भारतीयों का स्नेह और विश्वास। 9 अक्टूबर 2024 को 86 वर्ष की आयु में उनके निधन से राष्ट्र ने एक महान विज़नरी को खो दिया। रतन टाटा भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी विरासत—नैतिकता, नवाचार, मानवता और भारतभक्ति—सदैव अमर रहेगी।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 28 दिसंबर को मनाये जाने वाले “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्थापना दिवस” के बारे में:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्थापना दिवस हर वर्ष 28 दिसंबर को मनाया जाता है। कांग्रेस भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सबसे प्रमुख राजनीतिक संगठन रहा, जिसने राष्ट्र को एकजुट करने और आज़ादी की लड़ाई को दिशा देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। इसका गठन 28 दिसंबर 1885 को मुंबई (तब बंबई) में हुआ था। इस संगठन की स्थापना ब्रिटिश अधिकारी ए. ओ. ह्यूम (Allan Octavian Hume) ने भारतीय नेताओं की सहायता से की। कांग्रेस की पहली बैठक मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में हुई, जिसकी अध्यक्षता वयोवृद्ध नेता वॉमेश चंद्र बनर्जी ने की थी। कांग्रेस का उद्देश्य भारतीयों को एक मंच प्रदान करना, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-मत तैयार करना और प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना था। समय के साथ यह संस्था राष्ट्रवाद का प्रमुख केंद्र बन गई। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, सरदार पटेल, लाला लाजपत राय, राजेंद्र प्रसाद जैसे महान नेताओं ने कांग्रेस के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया। स्थापना दिवस पर देशभर में सेमिनार, चर्चाएँ और कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को याद किया जाता है और लोकतंत्र एवं राष्ट्रीय एकता के मूल्यों को पुनः सुदृढ़ किया जाता है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि एकता, सत्य और लोकतांत्रिक संघर्ष के मार्ग से ही बड़े परिवर्तन संभव होते हैं।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “सही अवसर को पहचानें”
एक बार एक नौजवान युवक एक किसान की बेटी से विवाह करना चाहता था। वह farmer के पास अपनी इच्छा लेकर पहुँचा। किसान ने उसकी परख करने के लिए कहा, “अगर तुम खेत में छोड़े जाने वाले तीन बैलों में से किसी एक की भी पूँछ पकड़ लोगे, तो मैं अपनी बेटी की शादी तुमसे कर दूँगा।” युवक उत्साहित होकर खेत में खड़ा हो गया। किसान ने पहला दरवाज़ा खोला। उसमें से एक बहुत बड़ा और खतरनाक बैल बाहर आया। युवक डर गया और सोचने लगा कि इस बैल की पूँछ पकड़ना असंभव है। उसने अवसर टाल दिया और किनारे हट गया। कुछ देर बाद किसान ने दूसरा दरवाज़ा खोला। इस बार पहले से भी बड़ा और भयंकर बैल आया। युवक को लगा कि पहला बैल ही बेहतर था, पर अब मौका हाथ से निकल चुका था। वह फिर किनारे हो गया। अब आख़िरी दरवाज़ा खुला। युवक के चेहरे पर खुशी आ गई। इस बार एक छोटा और कमजोर बैल बाहर आया। उसे लगा कि यही मौका है! वह तुरंत पूँछ पकड़ने की मुद्रा में तैयार हो गया। पर जैसे ही बैल उसके पास आया—उसे आश्चर्य हुआ कि उस बैल की तो पूँछ थी ही नहीं! युवक तीनों अवसर खो बैठा। कहानी हमें सिखाती है कि जीवन अवसरों से भरा है—कुछ कठिन लगते हैं, कुछ आसान। लेकिन पहला अवसर ही अक्सर सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि हम डरकर या सोच-विचार में समय गँवाकर मौके छोड़ दें, तो बाद में मिलने वाले अवसर वैसा फल कभी नहीं देते। इसलिए हमेशा सही अवसर को पहचानें और समय पर उसे पकड़ लें, क्योंकि हर अवसर दोबारा नहीं मिलता।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







