सुप्रभात बालमित्रों!
27 दिसंबर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 27 दिसंबर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
जीवन में सफलता के लिए, संकल्प और समर्पण दोनों की आवश्यकता होती है।
To achieve success in life, both determination and dedication are necessary.
संकल्प हमें यह दिशा देता है कि हमें किस लक्ष्य की ओर बढ़ना है, जबकि समर्पण उस दिशा में निरंतर आगे बढ़ते रहने की शक्ति प्रदान करता है। बिना संकल्प के व्यक्ति अपने लक्ष्य तय ही नहीं कर पाता और बिना समर्पण के वह अपने प्रयासों को बीच में ही छोड़ देता है। कठिन परिस्थितियाँ हों या असफलताओं का दबाव, वही व्यक्ति आगे बढ़ पाता है जिसके भीतर दृढ़ निश्चय और लगातार मेहनत करने की लगन होती है। इतिहास भी इसी बात की पुष्टि करता है कि महान उपलब्धियाँ हमेशा उसी ने पाई हैं जिसने अपने लक्ष्य के प्रति अटूट संकल्प रखा और पूरे समर्पण से प्रयास किया। इस प्रकार संकल्प और समर्पण—दोनों सफलता के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: Distinguish : डिस्टिंगन्गुइश: भेद करना, अंतर पहचानना, अलग-अलग चीजों को पहचानकर अंतर बताना।
वाक्य प्रयोग: We should learn to distinguish between right and wrong. हमें सही और गलत के बीच भेद करना सीखना चाहिए।
उत्तर : चारपाई
v अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 27 दिसंबर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1571 – जर्मन गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री योहान केपलर का वेल डेर स्टाट स्वाबिया, जर्मनी में जन्म हुआ। उन्होंने ग्रहीय गति के तीन नियम प्रतिपादित किए, जो आधुनिक खगोल विज्ञान की नींव बने तथा न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत को प्रभावित किया।
- 1797 – उर्दू एवं फारसी भाषा के महान शायर मिर्जा गालिब का आगरा उत्तर प्रदेश में जन्म हुआ। उन्होंने उर्दू शायरी को नई ऊँचाई दी तथा 'दीवान-ए-गालिब' एवं पत्रों से हिन्दुस्तानी साहित्य को समृद्ध किया।
- 1911 – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित 'जन गण मन' को पहली बार राष्ट्रगान के रूप में गाया गया। यह अधिवेशन राष्ट्रपति विश्वंभरनाथ घोष के नेतृत्व में हुआ तथा स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना।
- 1942 – परमवीर चक्र विजेता लांस नायक अल्बर्ट एक्का का झारखंड के जरी गाँव गुमला जिला में जन्म हुआ। 1971 भारत-पाक युद्ध में गंगासागर की लड़ाई में उनके अदम्य साहस ने कंपनी को विजयी बनाया तथा वे शहीद हुए।
- 1945 – ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के समझौते के बाद अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष IMF की औपचारिक स्थापना हुई। 44 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा गठित यह संगठन वैश्विक वित्तीय स्थिरता एवं मुद्रा सहयोग का प्रमुख माध्यम बना।
- 1968 – नासा का अपोलो-8 मिशन फ्रैंक बोर्मन, जिम लवेल एवं विलियम एंडर्स को लेकर प्रशांत महासागर में सफलतापूर्वक उतरा। यह पहला मानवयुक्त चंद्र परिक्रमा मिशन था, जो 21-27 दिसंबर तक चला तथा चंद्रमा की 10 परिक्रमाएँ पूरी कीं।
v अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “प्रसिद्ध गणितज्ञ, भौतिक विज्ञानी और खगोलशास्त्री योहान केपलर” के बारे में।
योहान केपलर जर्मनी के प्रसिद्ध गणितज्ञ, भौतिक विज्ञानी और खगोलशास्त्री थे, जिन्होंने ग्रहों की गति को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जन्म 27 दिसंबर 1571 को जर्मनी के वाइर्ल में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि विज्ञान और गणित में थी। केपलर का सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा प्रतिपादित ग्रहों की गति के तीन नियम हैं, जिन्हें “केपलर के नियम” कहा जाता है। इन नियमों ने यह स्पष्ट किया कि ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं में घूमते हैं, उनकी गति दूरी के अनुसार बदलती है, और सूर्य, ग्रहों तथा समय के संबंधों को गणितीय रूप से समझाया जा सकता है। उनके सिद्धांतों ने खगोलशास्त्र को एक नई दिशा दी और बाद में न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत की नींव रखने में भी मदद की। वैज्ञानिक सत्य के प्रति उनकी लगन, कठिन परिस्थितियों में भी ज्ञान की खोज, और ब्रह्मांड के रहस्यों को गणित से समझने का प्रयास उन्हें इतिहास के महानतम वैज्ञानिकों में शामिल करता है।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 27 दिसंबर को मनाये जाने वाले “xxx” के बारे में:
हर वर्ष 27 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह दिवस – अंतर्राष्ट्रीय महामारी तैयारी दिवस – हमें यह याद दिलाता है कि किसी भी महामारी के सामने तैयारी करना कितना महत्वपूर्ण है। इस दिवस को पहली बार आधिकारिक रूप से मनाया गया था 27 दिसंबर 2020 को, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा UN General Assembly ने 7 दिसंबर 2020 को एक प्रस्ताव के माध्यम से इस दिवस की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य महामारी-प्रवण खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ाना, भविष्य की तैयारी को मजबूत करना तथा देशों और संस्थाओं को मिलकर कार्य करने के लिए प्रेरित करना था। विशेष रूप से, यह दिवस हमें यह सिखाता है कि सिर्फ महामारी आने पर प्रतिक्रिया करना पर्याप्त नहीं है—बल्कि रोकथाम, जल्दी पहचान, तयारी, और सहयोग ही लंबी अवधि में स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। COVID-19 महामारी ने स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक स्वास्थ्य-प्रणाली कितनी कमजोर हो सकती है और उसी के परिणामस्वरूप यह दिन स्थापित किया गया था। इस दिन पर विभिन्न देशों में जागरूकता कार्यक्रम, शिक्षा-सत्र, स्वास्थ्य-प्रणाली निर्माण की पहल तथा वैश्विक साझेदारी को बढ़ावा देने वाली गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। यह सिर्फ एक निशानी दिवस नहीं है, बल्कि एक चेतावनी और प्रेरणा दोनों है कि हम भविष्य में आने वाली स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए पहले से तैयार रहें।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “वाणी का व्यवहार”
एक बार एक राजा वन-विहार पर निकले। चलते-चलते उन्हें प्यास लगी। उन्होंने दूर एक अंधे व्यक्ति की छोटी-सी झोपड़ी देखी। झोपड़ी में पानी से भरा घड़ा दिखाई दे रहा था। राजा ने सिपाही को भेजकर एक लोटा पानी लाने को कहा। सिपाही झोपड़ी पर पहुँचा और कठोर स्वर में बोला, “ऐ अंधे! ज़रा एक लोटा पानी दे दे!” सिपाही की रूखी वाणी सुनकर अंधा नाराज़ हो गया। उसने तुरंत कहा, “चल जा यहाँ से! तुम्हें पानी नहीं मिलेगा।” सिपाही खाली हाथ लौट आया। तब राजा ने सेनापति को भेजा। सेनापति ने पहुँचकर कहा, “अंधे, पानी दे देगा? पैसा दूँगा।” सेनापति की अकड़ और घमंड भरी आवाज़ सुनकर अंधा फिर चिढ़ गया। उसने कहा, “पहले वाले से बड़ा मालूम पड़ता है! जा-जा, यहाँ पानी नहीं मिलेगा!” सेनापति भी निराश लौट आया। अब राजा स्वयं अंधे की झोपड़ी की ओर बढ़े। उन्होंने नम्रता से उसे प्रणाम किया और कहा, “प्यास से गला सूख रहा है। यदि आप एक लोटा पानी दे सकें तो बड़ी कृपा होगी।” राजा की विनम्र और मधुर वाणी सुनकर अंधे ने खुशी-खुशी उन्हें पास बिठाया और बोला, “आप जैसे सज्जनों का तो राजा जैसा सम्मान है। पानी तो क्या, मेरा सब कुछ आपकी सेवा में हाज़िर है।” राजा ने शीतल जल पिया और शांत स्वर में पूछा, “आपको दिखाई नहीं देता, फिर आपने सिपाही, सेनापति और राजा को कैसे पहचान लिया?” अंधे ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “महाराज! वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति की असल पहचान पता चल जाती है। जिस तरह कोई बोलता है, उसी से उसका स्वभाव दिखाई दे जाता है।” कहानी हमें सिखाती है कि वाणी तीर की तरह होती है—एक बार निकल जाए तो वापस नहीं लौटती। इसलिए हमेशा सोच-समझकर बोलना चाहिए। हमारी वाणी में मिठास हो तो लोग खुश होते हैं, लेकिन कठोर वाणी किसी का दिल दुखा सकती है।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







