सुप्रभात बालमित्रों!
20 सितम्बर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 20 सितम्बर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है,
आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे,
नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से: "All action results from thought."
अर्थात हमारे सभी कर्मों की जड़ हमारे विचारों में होती है। हम जो भी निर्णय लेते हैं, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, उसका प्रारंभिक बिंदु हमारा विचार ही होता है।
विचार हमारी भावनाओं को जन्म देते हैं और वे भावनाएँ आगे चलकर हमारे कर्मों को प्रभावित करती हैं। यदि कोई विचार बार-बार मन में आता है, तो वह आदत बन जाता है और अंततः स्वचालित रूप से हमारे कार्यों का रूप ले लेता है। इसीलिए कहा गया है कि हमारे विचार ही हमारे जीवन के निर्माता हैं।
अगर हम चाहते हैं कि जीवन सफल, संतुलित और खुशहाल बने, तो हमें अपने विचारों को सकारात्मक बनाना होगा। इसके लिए ध्यान, आत्मविश्वास, और स्पष्ट लक्ष्य निर्धारण जैसे अभ्यास अत्यंत सहायक होते हैं। जब विचार सकारात्मक और रचनात्मक होते हैं, तो कर्म भी श्रेष्ठ होते हैं और परिणामस्वरूप जीवन भी उज्ज्वल और सार्थक बन जाता है।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: NATURAL : नेचुरल अर्थ: प्राकृतिक, कुदरती, सहज या स्वाभाविक। Something that exists in nature, not artificial; inborn, normal or usual.
वाक्य प्रयोग: It is natural to feel nervous before an exam. परीक्षा से पहले घबराना स्वाभाविक यानी नेचुरल है।
यह है सब की आँखों का तारा हम सब इसको करते सम्मान।
जवाब: हमारे देश का तिरंगा झंडा
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 20 सितम्बर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1831: गोर्डन ब्रान्ज़ ने भाप से चलने वाली पहली बस का आविष्कार किया। यह बस एक समय में 30 यात्रियों को ले जा सकती थी, हालांकि इसकी गति धीमी थी। इस आविष्कार ने परिवहन के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत की, जिसने आधुनिक सार्वजनिक परिवहन की नींव रखी।
- 1857: भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने ब्रिटिश सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। ब्रिटिश मेजर विलियम हडसन ने उन्हें गिरफ्तार किया, जिसके बाद दिल्ली पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित हो गया।
- 1933: प्रख्यात समाजसेवी, लेखिका, स्वतंत्रता सेनानी और भारत-प्रेमी डॉ. एनी बेसेंट का निधन अड्यार, मद्रास (अब तमिलनाडु) में हुआ। अपनी प्रभावशाली लेखनी और सामाजिक कार्यों के माध्यम से उन्होंने भारतवासियों में स्वतंत्रता की भावना को जागृत किया और सामाजिक सुधारों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- 1942: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान असम की वीरांगना कनकलता बरुआ ने तेजपुर में कचहरी पर तिरंगा फहराने का प्रयास किया। इस दौरान ब्रिटिश पुलिस ने उन पर गोली चलाई, जिसके परिणामस्वरूप वे शहीद हो गईं। उनकी शहादत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में साहस और बलिदान का प्रतीक बन गई।
- 1946: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहला कान फिल्म महोत्सव फ्रांस में आयोजित हुआ। यह आयोजन सिनेमा की दुनिया में एक प्रमुख वार्षिक कार्यक्रम बन गया, जो वैश्विक स्तर पर फिल्म कला को बढ़ावा देता है।
- 1977: वियतनाम को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता प्राप्त हुई। जो 1975 में वियतनाम के एकीकरण के बाद हुआ था।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे असम की वीरांगना “कनकलता बरुआ” के बारे में।
कनकलता बरुआ जिन्हें 'बीरबाला' या 'असम की लक्ष्मीबाई' कहा जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की युवा वीरांगना थीं। उनका जन्म असम के दरांग जिले के बोरंगाबाड़ी में हुआ। बचपन में माँ के देहांत के बाद उन्होंने तीसरी कक्षा तक पढ़ाई की और परिवार की देखभाल में लग गईं। ज्योति प्रसाद अग्रवाल के गीतों से प्रेरित होकर वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुईं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने मृत्यु-बाहिनी दस्ते का हिस्सा बनकर गोहपुर में तिरंगा फहराने का साहसिक प्रयास किया।
20 सितंबर 1942 को गोहपुर पुलिस थाने पर तिरंगा फहराने के दौरान ब्रिटिश पुलिस की गोलीबारी में कनकलता शहीद हो गईं। तिरंगे को थामे हुए उन्होंने अंतिम सांस तक इसे जमीन पर नहीं गिरने दिया। उनके बलिदान ने असम में स्वतंत्रता की ज्वाला को और भड़काया। उन्हें 'असम की रानी लक्ष्मीबाई' कहा जाता है, और उनके नाम पर स्मारक व छात्रावास स्थापित हैं। हर वर्ष 20 सितंबर को गोहपुर में उनकी शहादत को याद किया जाता है, जो युवाओं को देशभक्ति और साहस की प्रेरणा देती है।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 20 सितम्बर को मनाये जाने वाले “राष्ट्रीय सिनेमा दिवस” के बारे में:
राष्ट्रीय सिनेमा दिवस भारतीय सिनेमा को समर्पित एक विशेष अवसर है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को सिनेमाघरों में वापस लाना और फिल्म उद्योग को बढ़ावा देना है। इस दिन देशभर के सिनेमाघरों में फिल्म टिकट की कीमत केवल 99 रुपये रखी जाती है। साथ ही कई सिनेमाघरों में विशेष स्क्रीनिंग, फिल्म संगीत कार्यक्रम और फिल्म प्रश्नोत्तरी जैसी गतिविधियाँ भी आयोजित की जाती हैं।
कोरोना काल में लंबे समय तक सिनेमाघर बंद रहे, जिसके कारण मूवी थिएटरों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। महामारी के बाद लोगों की सिनेमाघरों में उपस्थिति काफी कम हो गई थी। इसी स्थिति को सुधारने और दर्शकों को फिर से बड़े पर्दे की ओर आकर्षित करने के लिए मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MAI) ने 23 सितंबर 2022 को पहला राष्ट्रीय सिनेमा दिवस मनाया। तब से यह दिन हर साल मनाया जाता है और फिल्म प्रेमियों के लिए बड़े पर्दे पर मनोरंजन का खास अवसर बन गया है।
लोकतंत्र के महान समर्थक अब्राहम लिंकन एक बार अपने गांव के नजदीक एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। भाषण के बीच एक महिला खड़ी होकर बोली, “अरे, यह राष्ट्रपति है? यह तो हमारे गांव के मोची का लड़का है।”
अपने प्रति ये अपमानजनक शब्द सुनकर लिंकन ने बड़े ही विनम्र शब्दों में उस महिला से कहा, “मैडम! आपने बहुत अच्छा किया जो उपस्थित जनता से मेरा यथार्थ परिचय करा दिया, मैं वही मोची का बेटा हूँ। क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकता हूँ?” “अवश्य,” उस महिला ने कहा।
तब लिंकन ने पूछा, “क्या आप यह बताने का कष्ट करेंगी कि मेरे पिताजी ने आपके जूते आदि तो ठीक तरह से मरम्मत किए थे न? आपको उनके कार्य में कोई शिकायत तो नहीं मिली।” उस महिला ने सफाई देते हुए कहा, “नहीं, नहीं, उनके कार्य में कोई शिकायत नहीं मिली। वे अपना काम बड़ी अच्छी तरह करते थे।”
लिंकन ने उत्तर दिया, “मैडम! जिस प्रकार मेरे मोची पिता ने अपने कार्य में आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दिया, उसी प्रकार मैं भी आपको आश्वस्त करता हूँ कि आपने मुझे राष्ट्रपति के रूप में सेवा करने का जो मौका दिया है, उसे मैं बड़ी ही कुशलता से करूंगा और यह मेरी कोशिश रहेगी कि मेरे काम में आपको कोई शिकायत का मौका न मिले।”
यह है अमेरिकी इतिहास के सर्वाधिक सफल राष्ट्रपति लिंकन की विनम्रता का उदाहरण, जिन्हें आज भी बड़ी श्रद्धा एवं आदर के साथ स्मरण किया जाता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि विनम्रता आत्म-सम्मान का एक विशेष गुण है और विनम्रता से हम किसी भी स्थिति को सकारात्मक रूप में बदल सकते हैं। लिंकन ने यह सुनिश्चित किया कि वे राष्ट्रपति के रूप में भी उसी कुशलता और समर्पण से कार्य करेंगे जैसे उनके पिताजी ने अपने काम में किया था। यह हमें सिखाता है कि किसी भी भूमिका में हमें अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







