सुप्रभात बालमित्रों!
19 सितम्बर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 19 सितम्बर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है,
आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में,
जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
अगर आप सफल होना चाहते हैं, तो हर दिन खुद को बीते हुए दिन से बेहतर बनाइये।
If you want to be successful then make yourself better every day from the previous day.
सफलता कोई अचानक मिलने वाला तोहफा नहीं है। यह निरंतर प्रयास और लगन का फल है। अगर आप जीवन में सफलता के शिखर छूना चाहते हैं, तो आपको हर दिन खुद को बेहतर बनाने की आदत डालनी होगी। हर दिन एक नया अवसर होता है खुद को विकसित करने का।
आज आप जो हैं, उससे कल थोड़ा और बेहतर बनने का प्रयास करें। चाहे वह कोई नई चीज़ सीखना हो, कोई नया कौशल विकसित करना हो या फिर अपनी पुरानी गलतियों से सीखना हो, हर दिन कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करें। याद रखें: सफलता एक यात्रा है, एक गंतव्य नहीं। इसलिए, हर दिन खुद को बेहतर बनाने की यात्रा जारी रखें।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: JUDGE: जज : न्याय, निर्णय, न्यायाधीश। जज का मूल अर्थ न्याय करना या निर्णय लेना होता है।
वाक्य प्रयोग: The judge announced the final verdict. जज ने अंतिम निर्णय सुनाया।
ठण्ड लगे तो जला लेना, बोलो क्या ?
उत्तर : नारियल ।
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 19 सितम्बर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1893: न्यूजीलैंड दुनिया का पहला स्व-शासित देश बना, जिसने महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया।
- 1936: हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विद्वान पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का निधन हुआ। उन्होंने "हिंदुस्तानी संगीत पद्धति" ग्रंथ लिखा और थाट प्रणाली को व्यवस्थित कर संगीत शिक्षा को नई दिशा दी।
- 1960: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल-बंटवारे की संधि पर कराची में हस्ताक्षर हुए। जो सिंधु और उसकी सहायक नदियों के जल बंटवारे को नियंत्रित करती है।
- 1965: भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स का जन्म ओहियो, अमेरिका में हुआ। वे नासा की दूसरी भारतीय मूल की महिला यात्री हैं और अंतरिक्ष में 322 दिनों तक रहने का विश्व रिकॉर्ड रखती हैं।
- 2000: कर्णम मल्लेश्वरी ने सिडनी ओलंपिक में भारोत्तोलन 69 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक जीता। वे ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।
- 2023: 19 सितंबर 2023 को लोकसभा में विशेष सत्र के दौरान "संविधान का 106वां संशोधन विधेयक" महिला आरक्षण बिल पेश किया गया, जिसे "नारी शक्ति वंदन अधिनियम" नाम दिया गया। यह विधेयक लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे महिला अंतरिक्ष यात्री “सुनीता विलियम्स” के बारे में।
सुनीता विलियम्स, भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री, का जन्म 19 सितंबर 1965 को ओहियो, अमेरिका में हुआ। उनके पिता दीपक पांड्या (गुजराती) न्यूरोसर्जन और माता बोनी पांड्या स्लोवेनियाई थीं। उन्होंने 1987 में यू.एस. नेवल अकादमी से भौतिक विज्ञान में स्नातक और 1995 में फ्लोरिडा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग प्रबंधन में मास्टर्स किया। नौसेना में हेलीकॉप्टर और टेस्ट पायलट के बाद, वे 1998 में नासा में शामिल हुईं।
सुनीता ने तीन अंतरिक्ष मिशनों में हिस्सा लिया। 2006-07 में ISS पर अभियान 14/15 कुल 195 दिन में चार स्पेसवॉक कुल 29 घंटे 17 मिनट किए और अंतरिक्ष में पहली मैराथन दौड़ पूरी की। 2012 में अभियान 32/33 कुल 127 दिन में तीन स्पेसवॉक कुल 21 घंटे 23 मिनट किए। दोनों मिशनों में उनकी कुल अवधि 322 दिन थी, जो उस समय किसी महिला अंतरिक्ष यात्री के लिए विश्व रिकॉर्ड था।
2024 में बोइंग स्टारलाइनर मिशन Crew Flight Test में वे और बैरी विल्मोर ISS पर गए, लेकिन यान की खराबी के कारण 286 दिन तक फंसे रहे। स्टारलाइनर को सितंबर 2024 में बिना चालक दल के वापस भेजा गया, और सुनीता 18 मार्च 2025 को SpaceX Crew-9 के ड्रैगन फ्रीडम यान से फ्लोरिडा तट पर लौटीं। इस दौरान उन्होंने 150+ वैज्ञानिक प्रयोग किए।
सुनीता के सात स्पेसवॉक कुल 50 घंटे 40 मिनट का महिला रिकॉर्ड हैं। उनकी उपलब्धियों ने भारत में युवाओं, विशेषकर महिलाओं, को प्रेरित किया। उन्हें पद्म भूषण 2008 और नासा स्पेस फ्लाइट मेडल मिले। सुनीता साहस और वैज्ञानिक उत्कृष्टता की प्रतीक हैं।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 19 सितम्बर को मनाये जाने वाले “अंतर्राष्ट्रीय समुद्री डाकू की तरह बात करें दिवस” बारे में:
हर साल 19 सितंबर को मनाया जाने वाला International Talk Like a Pirate Day यानी अंतर्राष्ट्रीय समुद्री डाकू की तरह बात करें दिवस एक अनोखा और मजेदार दिवस है। इस दिवस की शुरुआत दो दोस्तों, जॉन बाउर और मार्क समर्स ने की थी, जो समुद्री डाकुओं की कहानियों के बहुत शौकीन थे।
साल 2002 में, उन्होंने इस दिवस को लोकप्रिय बनाने के लिए एक स्तंभकार डेव बैरी को पत्र लिखा। बैरी को यह विचार बहुत पसंद आया और उन्होंने अपने स्तंभों में इसका प्रचार किया। लोगों ने भी इस अनोखे त्योहार को पसंद किया और धीरे-धीरे यह एक लोकप्रिय बन गया।
यह दिवस बच्चों के लिए विशेष रूप से मजेदार हो सकता है। आजकल बच्चे टेक्नोलॉजी की दुनिया में इतने खो गए हैं कि वे कहानियों और खेलों से दूर हो गए हैं। आप इस दिन बच्चों के साथ समुद्री डाकुओं की तरह कपड़े पहनकर, समुद्री डाकुओं की कहानियां सुनाकर, पाइरेट थीम वाली पार्टी आयोजित कर, समुद्री डाकुओं के बारे में किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर इस दिवस को मना सकते हैं।
यह दिवस बच्चों को रचनात्मक होने और अपनी कल्पना का उपयोग करने का अवसर देता है। यह उन्हें इतिहास और विभिन्न संस्कृतियों के बारे में भी सीखने का मौका देता है।
एक सुबह बादशाह अकबर नींद से उठे और अपनी दाढ़ी खुजलाते हुए बोले, “अरे, कोई है?” तुरंत एक सेवक हाजिर हुआ। उसे देखते ही बादशाह ने कहा – “जाओ, जल्दी बुलाकर लाओ, फौरन हाजिर करो।”
सेवक हैरान रह गया। उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि किसे बुलाना है, किसे हाजिर करना है। लेकिन बादशाह से पलटकर पूछने की हिम्मत भी उसमें नहीं थी। उसने यह बात दूसरे सेवक को बताई। दूसरे ने तीसरे को और तीसरे ने चौथे को। इस तरह सभी सेवक उलझन में पड़ गए कि आखिर किसे बुलाएँ।
इसी बीच बीरबल सुबह की सैर पर निकले थे। उन्होंने बादशाह के निजी सेवकों को भाग-दौड़ करते देखा, तो तुरंत समझ गए कि जरूर बादशाह ने कोई अनोखा आदेश दिया होगा, जो सबके लिए पहेली बन गया है। उन्होंने एक सेवक को रोककर पूछा – “क्या हुआ? तुम सब परेशान क्यों हो?”
सेवक ने घबराते हुए बताया – “महाराज, बादशाह ने कहा है कि किसी को जल्दी बुलाकर लाओ और फौरन हाजिर करो। मगर हमें समझ ही नहीं आ रहा कि किसे बुलाएँ। अगर हम तुरंत किसी को लेकर नहीं गए तो हमारी खैर नहीं।” बीरबल ने मुस्कुराते हुए पूछा – “अच्छा यह बताओ, जब बादशाह ने हुक्म दिया तब वे क्या कर रहे थे?” सेवक बोला – “जब उन्होंने मुझे तलब किया, तब वे बिस्तर पर बैठे अपनी दाढ़ी खुजला रहे थे।”
बस इतना सुनते ही बीरबल सब समझ गए। और उन्होंने कहा – “जाओ, हज्जाम को बुलाओ।” सेवक तुरंत हज्जाम को लेकर दरबार में पहुँचा। बादशाह ने हज्जाम को देखकर सोचा – “अरे, मैंने तो नाम ही नहीं बताया था, फिर सेवक ने सही व्यक्ति को कैसे बुला लिया?” उन्होंने सेवक से पूछा – “सच बताओ, हज्जाम को अपने मन से लाए हो या किसी ने सलाह दी थी?”
सेवक डर गया, पर सच्चाई छुपा नहीं सका। उसने काँपती आवाज़ में कहा – “जहाँपनाह, हज्जाम को बुलाने का सुझाव बीरबल ने दिया था।” यह सुनकर बादशाह अकबर बीरबल की बुद्धिमानी और सूझबूझ पर प्रसन्न हो गए।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बुद्धिमानी और समझदारी से किसी भी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। बीरबल ने सेवक की उलझन को समझकर सही व्यक्ति को बुलाने का सुझाव दिया, जिससे समस्या का हल निकल आया। यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि किसी भी स्थिति में धैर्य और सूझबूझ से काम लेना चाहिए।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







