सुप्रभात बालमित्रों!
11 दिसंबर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 11 दिसंबर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
“परिवार ही संसार में सबसे महत्त्वपूर्ण है।”
“Family is the most important thing in the world.”
परिवार हमारे जीवन की वह पहली पाठशाला है, जहाँ हमें बिना किसी शर्त के प्यार, विश्वास और सुरक्षा मिलती है। यहीं से हमारे संस्कार, हमारे मूल्य और दुनिया को देखने का नजरिया आकार लेता है। परिवार के सदस्य न केवल हमारी खुशियों में साझेदार बनते हैं, बल्कि कठिन समय में ढाल बनकर हमारे साथ खड़े रहते हैं। वे हमें गिरकर दोबारा उठना, टूटकर फिर से जुड़ना और संघर्षों में भी मुस्कुराना सिखाते हैं। परिवार की उपस्थिति जीवन को दिशा देती है। जब समस्याएँ बड़ी हों या छोटी, परिवार का साथ हर चुनौती को आसान बना देता है। उनका समर्थन हमें हिम्मत, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की शक्ति देता है, जिससे हम अपने सपनों को साकार कर पाते हैं। परिवार ही वह आधार है जो हमें मजबूत, स्थिर और संवेदनशील इंसान बनाता है। इसलिए, परिवार को प्यार, आदर और समझ से संजोकर रखना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है:
EFFECTIVE : इफ्फेक्टिव : प्रभावी, यानी किसी काम, विधि या प्रक्रिया का सफलतापूर्वक, सही तरीके से और अच्छे परिणाम के साथ पूरा होना।
जब कोई चीज़ प्रभावी होती है, तो वह अपेक्षित परिणाम हासिल करती है।
वाक्य प्रयोग: This medicine is very effective for cold and fever. यह दवा सर्दी-जुकाम के लिए बहुत प्रभावी है।
उत्तर : मेंढक
v अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 11 दिसंबर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1687 – ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में पहला नगर निगम मद्रास कॉर्पोरेशन स्थापित किया।
- 1845 – ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और सिख साम्राज्य के बीच प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध की शुरुआत हुई। सिख सेना ने सतलुज नदी पार कर ब्रिटिश क्षेत्र में प्रवेश किया, जिससे युद्ध की घोषणा हुई तथा यह संघर्ष 1846 तक चला, जिसमें सिखों को हार का सामना करना पड़ा।
- 1901 – इतालवी आविष्कारक गुग्लेल्मो मार्कोनी ने कॉर्नवाल इंग्लैंड से न्यूफाउंडलैंड कनाडा तक 3,500 किलोमीटर दूर तक बिना तार के पहला ट्रांस-अटलांटिक रेडियो सिग्नल भेजा। जिसने आधुनिक वायरलेस संचार की नींव रखी।
- 1922 – हिंदी सिनेमा के 'ट्रेजडी किंग' दिलीप कुमार जिनका असली नाम मुहम्मद यूसुफ खान था का पेशावर वर्तमान पाकिस्तान में जन्म हुआ। उन्होंने 60 वर्षों में 75 फिल्मों में अभिनय किया तथा मुगल-ए-आजम, देवदास जैसी क्लासिक्स से भारतीय सिनेमा को अमर योगदान दिया।
- 1935 – भारत के 13वें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का मिराटी पश्चिम बंगाल में जन्म हुआ। उन्होंने भारत के वित्त, रक्षा एवं विदेश मंत्री के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई तथा 2012-2017 तक राष्ट्रपति रहे।
- 1946 – संयुक्त राष्ट्र महासभा ने न्यूयॉर्क में UNICEF : संयुक्त राष्ट्र बाल कोष की स्थापना की। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बच्चों को भोजन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू यह संगठन आज विश्वभर में बाल कल्याण का प्रमुख माध्यम है।
- 1946 – नई दिल्ली में संविधान सभा की दूसरी बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया। प्रथम बैठक में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा अस्थायी अध्यक्ष थे, तथा प्रसाद के नेतृत्व में संविधान का मसौदा तैयार हुआ जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
- 1969 – पांच बार के विश्व शतरंज चैंपियन विश्वनाथन आनंद का चेन्नई तत्कालीन मद्रास में जन्म हुआ। उन्होंने भारत को शतरंज का वैश्विक केंद्र बनाया तथा 2007-2013 तक FIDE विश्व चैंपियन रहे।
- 2003 – संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस की पहली बार घोषणा की। यह दिवस पर्वतों के सतत विकास, जैव विविधता एवं जल संसाधनों के महत्व को उजागर करने के लिए मनाया जाता है।
v अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “विश्व शतरंज चैंपियन विश्वनाथन आनंद” के बारे में।
विश्वनाथन आनंद, भारत के सर्वश्रेष्ठ शतरंज खिलाड़ियों में से एक हैं और विश्वभर में सम्मानित ग्रैंडमास्टर हैं। उनका जन्म 11 दिसंबर 1969 को चेन्नई में हुआ। बचपन से ही उनकी स्मरण शक्ति तेज थी और वे शतरंज की चालों को अद्भुत गति से समझ लेते थे। आनंद ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल कर भारत का नाम दुनिया में रोशन किया। वे पाँच बार के विश्व शतरंज चैंपियन रह चुके हैं और उनकी तेज, सटीक और आक्रामक खेलने की शैली के कारण उन्हें “लाइटनिंग किड” भी कहा जाता है। आनंद ने शतरंज को भारत में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में स्वर्णिम इतिहास रचा और भारत को पहली बार विश्व शतरंज खिताब दिलाया। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और खेलों का सर्वोच्च सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न दिया गया है जिसे अब खेल रत्न भी कहा जाता है। विश्वनाथन आनंद आज भी नए खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं और भारत में शतरंज को नई ऊँचाइयों तक ले जाने में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 11 दिसंबर को मनाये जाने वाले “अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस” के बारे में:
अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस हर साल 11 दिसंबर को मनाया जाता है। यह दिवस पर्वतों के संरक्षण, उनकी महत्वपूर्ण भूमिका और उनमें रहने वाले लोगों के जीवन को समझने के उद्देश्य से मनाया जाता है। पर्वत न केवल प्राकृतिक सुंदरता का प्रतीक हैं, बल्कि वे हमें स्वच्छ हवा, ताज़ा पानी, औषधियाँ, खाद्य पदार्थ और अनेक प्राकृतिक संसाधन प्रदान करते हैं। दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से पर्वतों पर निर्भर रहती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2002 को अंतरराष्ट्रीय पर्वत वर्ष घोषित किया और 2003 से 11 दिसम्बर को अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस के रूप में मनाने का संकल्प लिया। जलवायु परिवर्तन, कटाई, खनन और पर्यावरण प्रदूषण के कारण पर्वत और उनका पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में है। इसलिए, इस दिवस का मुख्य उद्देश्य है—पर्वतों की सुरक्षा, उनके संसाधनों का संरक्षण और पर्वतीय समुदायों के विकास के प्रति जागरूकता फैलाना। अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए पर्वतों की रक्षा आवश्यक है। हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बने और पर्वतों को सुरक्षित रखने के प्रयासों में सहयोग करे।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “दिव्य ज्ञान”
कृशा गौतमी श्रावस्ती के एक निर्धन परिवार में जन्मी थी। सुंदरता के कारण उसका विवाह एक धनी व्यक्ति से हो गया। लेकिन वहां उसका अक्सर अपमान होता था। जब उसके पुत्र का जन्म हुआ तो उसे सम्मान मिलने लगा। समय के साथ उसके पुत्र की अचानक मृत्यु हो गई। गौतमी को इतना दुख हुआ कि वह विक्षिप्त हो गई और पुत्र के शव को लेकर इधर-उधर भटकने लगी। अंततः वह तथागत बुद्ध के पास पहुंची और पुत्र को जीवित करने की याचना करने लगी। तथागत ने उससे कहा, "तुम उस घर से सरसों के दाने ले आओ, जहां कभी किसी की मृत्यु नहीं हुई हो।" गौतमी प्रत्येक घर में गई लेकिन ऐसा कोई घर नहीं मिला जहां कभी मृत्यु नहीं हुई हो। तब गौतमी समझ गई कि इस संसार में जो आया है उसे एक न एक दिन मरना ही होगा। इस तरह तथागत ने गौतमी को दिव्य ज्ञान देते हुए उसकी समस्या का समाधान किया। शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि मृत्यु जीवन का एक अनिवार्य और अटल सत्य है। हमें इसे स्वीकार करना चाहिए और इसके डर या दुःख में फंसकर जीवन जीने की खुशी को नहीं खोना चाहिए।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







