सुप्रभात बालमित्रों!
4 सितम्बर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 4 सितम्बर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है,
आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में,
जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
"सत्य से प्यार करें और गलती को क्षमा कर दें।”
"Love truth, and pardon error."
यह कथन हमें बताता है कि हमें हमेशा सच्चाई का साथ देना चाहिए और जीवन में ईमानदार बने रहना चाहिए। इंसान से कभी न कभी गलती हो जाती है, इसलिए दूसरों की गलतियों को क्षमा करने का गुण हमें अपनाना चाहिए। जो व्यक्ति सत्यप्रिय होता है और क्षमाशील होता है, वही जीवन में महान बनता है।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है:
LACK (लैक) : कमी, अभाव, या न होना
जब किसी ज़रूरी चीज़, गुण, या साधन की पर्याप्त मात्रा न हो या वह पूरी तरह से न मिले, तो उस स्थिति को लैक कहते हैं।
वाक्य प्रयोग: He has a lack of interest in studies. उसे पढ़ाई में रुचि की कमी है।
उत्तर: छिपकली
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 4 सितम्बर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1665: मुग़लों और छत्रपति शिवाजी महाराज के बीच पुरंधर की संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसे राजा जयसिंह ने मध्यस्थता की।
- 1781: स्पेन के निवासियों द्वारा लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया की स्थापना की गई।
- 1825: प्रमुख भारतीय राजनीतिज्ञ दादाभाई नौरोजी का जन्म हुआ, जिन्हें भारत का "ग्रैंड ओल्ड मैन" कहा जाता है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
- 1880: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी, लेखक और समाजशास्त्री भूपेंद्रनाथ दत्त का जन्म हुआ। वे स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई थे और क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे।
- 1888: महात्मा गांधी ने इंग्लैंड के लिए अपनी समुद्री यात्रा शुरू की, जो उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
- 1894: प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता ज्ञानचंद्र घोष का जन्म हुआ।
- 1998: डरबन में 12वां गुट निरपेक्ष शिखर सम्मेलन सम्पन्न हुआ। यह सम्मेलन विकासशील देशों के बीच सहयोग और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए महत्वपूर्ण था।
- 1998 में आज ही लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन ने मिलकर गूगल सर्च इंजन को विकसित किया था। आज ही इन दोनों ने कंपनी के रूप में इसे रजिस्ट किया।
- 2004: ब्रिटिश-भारतीय फिल्म निर्माता गुरिंदर चड्ढा को उनके सिनेमाई योगदान, विशेष रूप से "बेंड इट लाइक बेकहम" जैसी फिल्मों के लिए ‘वूमैन ऑफ द ईयर’ सम्मान से नवाजा गया।
- 2018: अमेज़न 1 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति वाली दुनिया की दूसरी कंपनी बनी।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “दादाभाई नौरोजी” के बारे में।
दादाभाई नौरोजी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के महान नेता और समाज सुधारक थे। उनका जन्म 4 सितम्बर 1825 को बंबई (तब मुंबई) में हुआ था। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे और उन्हें "भारत का ग्रैंड ओल्ड मैन" कहा जाता है। दादाभाई नौरोजी पहले ऐसे भारतीय थे जिन्हें ब्रिटिश संसद का सदस्य चुना गया। उन्होंने भारत की आर्थिक स्थिति पर गहराई से अध्ययन किया और "ड्रेन ऑफ वेल्थ थ्योरी" प्रस्तुत की, जिसमें बताया कि किस प्रकार अंग्रेज भारत से धन लूटकर अपने देश ले जाते थे। उनका मानना था कि भारत की गरीबी का मुख्य कारण अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियाँ हैं। दादाभाई नौरोजी ने शिक्षा और सामाजिक सुधारों पर भी बल दिया। वे 1886, 1893 और 1906 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने। 30 जून 1917 को उनका निधन हुआ। दादाभाई नौरोजी भारत की आज़ादी की लड़ाई में उनके योगदान के लिए हमेशा याद किए जाते रहेंगे।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 4 सितम्बर को मनाये जाने वाले “गूगल सर्च इंजन के स्थापना दिवस” के बारे में:
गूगल सर्च इंजन की स्थापना 4 सितम्बर 1998 को कैलिफ़ोर्निया, अमेरिका में लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन ने की थी। इसी दिन इसे आधिकारिक रूप से कंपनी के रूप में दर्ज किया गया था। गूगल सर्च इंजन आज दुनिया का सबसे लोकप्रिय और भरोसेमंद खोज साधन है। गूगल की मदद से हम इंटरनेट पर किसी भी विषय की जानकारी कुछ ही सेकंड में प्राप्त कर सकते हैं। इसमें तस्वीरें, वीडियो, समाचार, मानचित्र, किताबें और लेख जैसे अनेक परिणाम आसानी से मिल जाते हैं। गूगल सर्च इंजन ने ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया को सरल, तेज़ और सुलभ बना दिया है। आज शिक्षा, व्यापार, विज्ञान, मनोरंजन और दैनिक जीवन के हर क्षेत्र में गूगल लोगों की ज़रूरत बन चुका है। इसने दुनिया को सूचना के महासागर से जोड़कर वास्तव में ज्ञान को सबके लिए उपलब्ध कराया है।
किसी जंगल में एक घोड़ा रहता था। जहाँ वह रहता था वहाँ बहुत सारी हरी-हरी, स्वादिष्ट और रसीली घास उगी हुई थी। घोड़ा चाव से घास खाता और आराम से जीवन बिता रहा था।
एक दिन वहाँ एक हाथी आ गया। हाथी को घास में घूमने और लोटने में बड़ा मज़ा आने लगा। वह घास को रौंद-रौंद कर खराब करने लगा। यह देखकर घोड़ा बहुत दुखी हो गया। हाथी को वह जगह इतनी पसंद आ गई कि वह जाने का नाम ही नहीं ले रहा था।
घोड़े ने सोचा – “हाथी को यहाँ से कैसे भगाया जाए? हाथी का सबसे बड़ा शत्रु तो शेर है, पर अगर शेर मुझे ही खा गया तो?” फिर उसने विचार किया – “क्यों न मनुष्य की सहायता ली जाए?”
घोड़ा मनुष्य के पास पहुँचा और सारी बात बताई। मनुष्य बोला – “हाथी को मारना आसान है, पर इसके लिए मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। अगर हाथी भागा तो मुझे उसका पीछा करना पड़ेगा, और इसके लिए मुझे तुम्हारी पीठ पर बैठना होगा।” घोड़ा उत्साह से बोला – “अगर हाथी मरेगा तो मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ।”
मनुष्य ने घोड़े पर जीन कस दी, मुँह में लगाम डाल दी और धनुष-बाण लेकर उस पर सवार हो गया। उसने हाथी पर जहरीले बाण चलाए। बाण लगते ही हाथी इधर-उधर भागने लगा और अंततः ज़हर के कारण गिरकर मर गया।
घोड़ा खुशी से बोला – “अब तुम नीचे उतरकर जीन और लगाम हटा दो। मैं तुम्हारा आभारी हूँ।” यह सुनकर मनुष्य ज़ोर से हँस पड़ा और बोला – “मुक्त होने की आशा अब छोड़ दो। यही तुम्हारे लिए अच्छा है।” उस दिन से घोड़ा हमेशा के लिए मनुष्य का गुलाम बन गया।
यह कहानी हमें सिखाती है कि हमें बिना सोचे-समझे किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए। दूसरों पर निर्भर होने से अक्सर स्वयं का नुकसान हो जाता है।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!








