सुप्रभात बालमित्रों!
25 फ़रवरी – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 25 फ़रवरी है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है,
आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे,
नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
"या आप अपने दिन को चलाते हैं, या दिन आपको चलाता है।"
"Either you run the day, or the day runs you."
हर दिन हमारे पास दो विकल्प होते हैं—पहला, आप दिन को चलाएं: यानी आप अपने दिन की योजना बनाएं, अपने लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार काम करें, और अपने समय को सही तरीके से प्रबंधित करें। दूसरा, दिन आपको चलाए: यानी आप बिना योजना के दिन बिताएं, जो होता है उसे होने दें, और परिस्थितियों या दूसरों के निर्णयों के अनुसार चलें।
यह कथन हमें बताता है कि हमारे पास अपने जीवन को नियंत्रित करने की शक्ति है। अगर हम सक्रिय रहें, अपने कार्यों को सोच-समझकर करें, और अपने समय का सही उपयोग करें, तो हम अपने दिन को बेहतर ढंग से जी सकते हैं। वहीं, यदि हम लापरवाही बरतें और योजना के बिना चलें, तो दिन हमें नियंत्रित करेगा और हम तनाव या असंतोष महसूस कर सकते हैं।
यह कथन हमें स्व-अनुशासन, योजना और सक्रियता का महत्व सिखाता है। हमें अपने जीवन की बागडोर अपने हाथों में लेनी चाहिए, न कि इसे संयोग या परिस्थितियों पर छोड़ देना चाहिए।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द, जो है: RAGE – जिसका अर्थ होता है क्रोध, रोष, गुस्सा या आक्रोश।
यह एक तीव्र और अनियंत्रित भावनात्मक प्रतिक्रिया है, जो किसी अन्याय, अपमान, या निराशा के कारण उत्पन्न होती है।
उदाहरण:
English: "His unfair behaviour filled me with rage."
हिंदी: "उसके अन्यायपूर्ण व्यवहार से मुझे बहुत क्रोध आया।"
तीनों अक्षर साथ रहें, तो पक्षी बने रंगीला।
जवाब – तीतर
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 25 फ़रवरी की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1836: सैमुएल कॉल्ट ने अपने आविष्कार कॉल्ट रिवॉल्वर के लिए अमेरिकी पेटेंट प्राप्त किया। यह रिवॉल्वर एक ऐसा हथियार था, जिसमें एक घूमने वाला सिलेंडर लगा होता था, जो इसे पहले के हथियारों से अधिक प्रभावी बनाता था।
- 1897: भारत के प्रसिद्ध विद्वान, साहित्यकार और शिक्षा शास्त्री अमरनाथ झा का जन्म हुआ। उन्होंने हिंदी और संस्कृत साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया और वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।
- 25 फरवरी 1988: भारत ने अपनी पहली स्वदेशी पृथ्वी मिसाइल का सफल परीक्षण किया। यह जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल थी, जिसे भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित किया गया।
- 25 फ़रवरी 2001: ऑस्ट्रेलिया के महान क्रिकेटर सर डोनाल्ड जॉर्ज ब्रैडमैन का निधन हुआ। उन्हें डॉन ब्रैडमैन के नाम से जाना जाता है और उनका टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाजी औसत 99.94 था, जो आज भी अद्वितीय रिकॉर्ड है।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “स्वतंत्रता सेनानी रविशंकर व्यास” के बारे में।
रविशंकर व्यास, जिन्हें रविशंकर महाराज के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख व्यक्ति थे। वे एक समाज सुधारक, शिक्षाविद और लेखक भी थे। उनका जन्म 25 फरवरी 1884 को गुजरात के खेड़ा जिले के रास गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम जगन्नाथ व्यास और माता का नाम पार्वतीबाई था।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा रास गांव में हुई, बाद में वे अहमदाबाद आए और वहाँ गुजरात कॉलेज में पढ़ाई की। रविशंकर व्यास भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे। उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।
1947 में भारत की आजादी के बाद, उन्होंने स्वयं को सामाजिक कार्य के लिए समर्पित कर दिया। वे भूदान आंदोलन में विनोबा भावे से जुड़े और 1955 से 1958 के बीच लगभग 6000 किलोमीटर की पदयात्रा की। 1960 में, गुजरात राज्य की स्थापना के समय 1 मई 1960 को उन्होंने ही गुजरात राज्य का उद्घाटन किया।
रविशंकर व्यास ने वात्रक नदी के आसपास के गांवों में लोगों का जीवन सुधारने, डाकुओं को पुनः मुख्यधारा में लाने, अंधश्रद्धा निवारण और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने दलितों और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए काम किया और कई स्कूलों व कॉलेजों की स्थापना की। उन्होंने गुजराती भाषा में कई किताबें और लेख लिखे।
उन्हें भारत सरकार द्वारा 1975 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 1 जुलाई 1984 को अहमदाबाद में उनका निधन हो गया। उनका जीवन हमें सेवा, सादगी और समर्पण की प्रेरणा देता है।
अभ्युदय वाणी दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे “भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO)” के बारे में।
भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) भारत का एक प्रमुख रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन है। इसकी स्थापना 1958 में हुई और इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। डीआरडीओ का मुख्य उद्देश्य भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना और देश को रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है। DRDO का स्थापना दिवस हर साल 1 जनवरी को मनाया जाता है।
डीआरडीओ, भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन आता है। यह भारत का सबसे बड़ा और सबसे विविध अनुसंधान संगठन है, जिसमें 5000 से अधिक वैज्ञानिक और 25,000 से अधिक अन्य कर्मचारी काम करते हैं। डीआरडीओ के 50 से अधिक प्रयोगशालाएँ और संस्थान पूरे भारत में फैले हैं, जो वैमानिकी, आयुध, इलेक्ट्रॉनिक्स, भूमि युद्ध इंजीनियरिंग, जीवन विज्ञान, सामग्री, मिसाइल और नौसेना प्रणाली जैसे विभिन्न क्षेत्रों में रक्षा प्रौद्योगिकियों का विकास करते हैं।
डीआरडीओ ने भारत की सशस्त्र सेनाओं को अत्याधुनिक हथियारों और उपकरणों से लैस करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डीआरडीओ ने अग्नि मिसाइल श्रृंखला, पृथ्वी मिसाइल, ब्रह्मोस मिसाइल, तेजस लड़ाकू विमान और अर्जुन टैंक जैसी कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियाँ और प्रौद्योगिकियाँ विकसित की हैं।
डीआरडीओ का काम न केवल देश की सुरक्षा को मजबूत करता है, बल्कि विज्ञान, इंजीनियरिंग और नवाचार के प्रति बच्चों और युवाओं को भी प्रेरित करता है।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “हिरण का बच्चा और बारासिंघा”
एक घने जंगल में एक हिरण का बच्चा और एक बारासिंघा साथ-साथ घास चर रहे थे। दोनों शांति से अपना भोजन कर रहे थे, तभी अचानक दूर से शिकारी कुत्तों का एक झुंड दिखाई दिया। बारासिंघा तुरंत झाड़ियों के पीछे छिप गया और हिरण के बच्चे से भी ऐसा ही करने के लिए कहा। हिरण का बच्चा थोड़ा हैरान हुआ, लेकिन बारासिंघा की बात मानकर वह भी झाड़ियों के पीछे छिप गया।
जब शिकारी कुत्ते चले गए, तो हिरण के बच्चे ने बारासिंघा से पूछा, "चाचा, आखिर आप इन शिकारी कुत्तों से इतने डर क्यों गए? आप तो इतने शक्तिशाली हो! आपके सींग नुकीले हैं, जिनसे आप उन्हें भगा सकते हो। आपके पैर लंबे हैं, जिनसे आप तेज दौड़ सकते हो। आपका शरीर भी उनसे कई गुना बड़ा है। फिर भी आप इतने भयभीत क्यों हो?"
बारासिंघा ने हिरण के बच्चे की बात ध्यान से सुनी और मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, तुम्हारी बात सही है। मैं शारीरिक रूप से शक्तिशाली हूं, लेकिन यह डर पीढ़ियों से हमारे अंदर बसा हुआ है। हमारे पूर्वजों ने यह अनुभव किया है कि जो भी इन शिकारी कुत्तों के चंगुल में फंसा, वह कभी जीवित नहीं बच पाया। यह डर हमारे खून में बस गया है और हमारी प्रतिक्रियाओं का हिस्सा बन गया है। इसलिए, हमें सतर्क रहना चाहिए और खतरे से बचने का प्रयास करना चाहिए।"
हिरण का बच्चा बारासिंघा की बात समझ गया और उसने महसूस किया कि कभी-कभी डर हमें सुरक्षित रखने का एक तरीका होता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि डर हमेशा कमजोरी नहीं होता, बल्कि यह हमें सुरक्षित रखने का एक साधन भी हो सकता है। हमें अपने पूर्वजों के अनुभव और ज्ञान का सम्मान करना चाहिए और सतर्क रहना चाहिए। शक्तिशाली होने के बावजूद सावधानी बरतना ही बुद्धिमानी है।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







