सुप्रभात बालमित्रों!
22 जनवरी – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 22 जनवरी है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
"चरित्र को बनाए रखना आसान है, बिगड़ने के बाद सुधारना कठिन।" "Character is much easier kept than recovered."
हमारे चरित्र को बनाए रखना अपेक्षाकृत सरल है, जैसे एक नया कपड़ा साफ और चमकदार होता है। उसे साफ रखने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती, बस ध्यान रखें कि वह गंदा न हो। इसी तरह, अगर हम अपने अच्छे व्यवहार और मूल्यों पर कायम रहें, तो हमारा चरित्र भी अच्छा रहेगा।
दूसरी ओर, अगर हमारा चरित्र बिगड़ जाए, तो उसे वापस सही दिशा में लाना बहुत कठिन होता है। जैसे गंदे कपड़े को वापस पहले जैसा साफ और चमकदार बनाना मुश्किल हो जाता है। उसे धोना, साफ करना और पूरी तरह से दाग हटाना कठिन होता है। उसी तरह, अगर हमारा चरित्र बिगड़ जाए, तो उसे वापस सही दिशा में लाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है और अक्सर लोग हमें पहले की तरह मान्यता नहीं देते।
इसलिए, सबसे अच्छा यही है कि हम शुरुआत से ही अपने चरित्र को सही रखें और उसे बिगड़ने न दें। यह कथन हमें सिखाता है कि सही राह पर चलना हमेशा आसान होता है, लेकिन गलतियाँ करने के बाद उसे सुधारना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसीलिए हमें अपने चरित्र की सुरक्षा के लिए सचेत रहना चाहिए और हमेशा सही मार्ग पर चलना चाहिए।
आगे बढ़ते हैं इस सफर में, और जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द: LADDER: लैडर: सीढ़ी।
सीढ़ी का उपयोग ऊँचाई तक पहुँचने या चढ़ने के लिए किया जाता है।
वो कौन सी चीज़ है, जो पानी पीकर मर जाती है।
उत्तर : प्यास।
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 22 जनवरी की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1905: रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में प्रदर्शनकारी मजदूरों पर गोलियां चलाई गईं। इस घटना को खूनी रविवार Bloody Sunday के नाम से जाना जाता है, जो 1905 की रूसी क्रांति का कारण बना।
- 1892: स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिवीर ठाकुर रोशन सिंह का जन्म हुआ। उन्हें काकोरी ट्रेन एक्शन के लिए फांसी दी गई थी।
- 1666: मुगल बादशाह शाहजहाँ का निधन हुआ। शाहजहाँ ने ताजमहल जैसे ऐतिहासिक स्मारक का निर्माण कराया।
- 1849: द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के दौरान मुल्तान की घेराबंदी समाप्त हुई और सिखों की हार के बाद अंग्रेजों द्वारा पंजाब पर कब्जा कर लिया गया।
- 1963: देहरादून में दृष्टिहीनों के लिए राष्ट्रीय पुस्तकालय की स्थापना की गई।
- 1901: 63 साल तक शासन करने वाली ब्रिटेन की क्वीन विक्टोरिया का निधन हुआ। विक्टोरिया महज 18 साल की उम्र में ब्रिटेन की महारानी बनी थीं और उन्होंने अपने साम्राज्य के चरम पर भारत सहित दुनिया के एक चौथाई हिस्से और 40 करोड़ से ज्यादा लोगों पर राज किया।
- 2009: फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर को ऑस्कर के लिए नामांकन मिला। इस फिल्म ने दुनिया भर में प्रसिद्धि प्राप्त की और भारतीय सिनेमा को एक नया मुकाम दिया।
- 2024: अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर में भगवान श्री रामलला की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हुई।
अब हम जानेंगे आज के प्रेरक व्यक्तित्व 'क्रान्तिवीर ठाकुर रोशन सिंह’ के बारे में।
ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी 1892 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के नबादा गाँव में हुआ था। उन्होंने असहयोग आंदोलन में शाहजहाँपुर और बरेली के ग्रामीण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बरेली में हुए गोलीकांड में उन्होंने एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर फायरिंग की, जिससे पुलिस को भागना पड़ा। इसके लिए उन्हें दो साल की सजा हुई।
1922 में चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेने पर, ठाकुर रोशन सिंह ने राम प्रसाद बिस्मिल और अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर एक बड़ी क्रांतिकारी पार्टी बनाने की योजना बनाई। इस पार्टी को धन की कमी थी, जिसे दूर करने के लिए उन्होंने डकैती का रास्ता अपनाया। 25 दिसंबर 1924 को बमरौली गाँव में पहली डकैती डाली गई, जिसमें 4000 रुपये और कुछ जेवरात मिले। इस डकैती में मोहनलाल पहलवान की मौत हो गई, जो ठाकुर रोशन सिंह की फांसी का कारण बनी।
9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड में ठाकुर रोशन सिंह शामिल नहीं थे, लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। बमरौली डकैती के साक्ष्यों के आधार पर उन्हें फांसी की सजा दी गई। 6 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद की नैनी जेल से उन्होंने अपने मित्र को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अपनी मौत को खुशी का कारण बताया और ईश्वर की कृपा का उल्लेख किया। पत्र के अन्त में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा था:
जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन!
वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं।
इलाहाबाद यानी वर्तमान प्रयागराज की नैनी स्थित मलाका जेल के फाँसी घर के सामने अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की आवक्ष प्रतिमा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान का उल्लेख करते हुए लगायी गयी है।
आज के दैनिक विशेष में हम जानेंगे 22 जनवरी को मनाये जाने वाले “जीवन दिवस” के बारे में:
22 जनवरी को हम जीवन दिवस मनाते हैं, जिसका उद्देश्य उन बच्चों और नाती-नातिनों का सम्मान करना है जो हमारे जीवन में खुशियाँ लाते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हर बच्चे और हर जीवन को सर्वोच्च सम्मान और गरिमा के साथ अनमोल उपहार के रूप में देखा जाना चाहिए।
बच्चे हमारे जीवन के सबसे बड़े खजाने हैं। वे बहुत तेजी से बड़े होते हैं और हर दिन नई चीजें सीखते रहते हैं। उनकी सरल बुद्धि और अवलोकन हमें हर दिन खुशियाँ देती है। उनके साथ बिताए गए पल हमें याद दिलाते हैं कि जीवन कितना प्यारा और कीमती है। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि हम उनके साथ समय बिताएं और उन्हें वह प्यार और देखभाल दें जिसके वे हकदार हैं।
इस दिन का जश्न मनाने के लिए हम बच्चों के साथ कुछ खास पल बिता सकते हैं। चाहे वह किसी बच्चे, नाती-नातिन, भतीजे या भतीजी के साथ हो, हमें उनके साथ समय साझा करके और उनकी मासूमियत का आनंद लेकर इस दिन को यादगार बनाना चाहिए।
जीवन दिवस हमें यह सिखाता है कि बच्चों की खुशी और उनके जीवन का सम्मान करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके साथ बिताए गए पलों को संजोना और उन्हें प्यार और सुरक्षा देना ही इस दिन का वास्तविक उद्देश्य है।
अभ्युदयवाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: मां का प्यार
एक बार की बात है, बच्चों को पिकनिक के लिए वाइल्डलाइफ नेशनल पार्क ले जाया जा रहा था। सभी बच्चे हिरनों, बंदरों और जंगली पक्षियों को देखकर बहुत रोमांचित हो रहे थे। तभी गाइड ने सभी को शांत रहने का इशारा करते हुए कहा, "शशश... आप लोग बिलकुल चुप हो जाइए और उस तरफ देखिए। यह एक दुर्लभ दृश्य है, एक मादा जिराफ़ अपने बच्चे को जन्म दे रही है।"
सभी बच्चों ने उत्सुकता से वह दृश्य देखा। मादा जिराफ़ बहुत लंबी थी और जैसे ही उसका बच्चा जन्मा, वह करीब दस फुट की ऊंचाई से जमीन पर गिरा। गिरते ही उसने अपने पांव अंदर की तरफ मोड़ लिए, मानो वह अभी भी अपनी मां की कोख में हो।
तभी माँ जिराफ़ ने बच्चे को जोर से एक लात मारी और बच्चा अपनी जगह से पलट गया। बच्चे मास्टर जी से कहने लगे, "सर, आप उस जिराफ़ को रोकिए नहीं तो वह बच्चे को मार डालेगी।" पर मास्टर जी ने उन्हें शांत रहने को कहा।
माँ जिराफ़ ने फिर से उसे जोर से लात मारी। इस बार बच्चा उठ खड़ा हुआ और डगमगाते हुए चलने लगा। धीरे-धीरे माँ और बच्चा झाड़ियों में ओझल हो गए।
बच्चों ने पूछा, "सर, वह जिराफ़ अपने ही बच्चे को लात क्यों मार रही थी? अगर बच्चे को कुछ हो जाता तो?"
मास्टर जी बोले, "बच्चों, जंगल में बहुत से खूंखार जानवर होते हैं। यहां किसी बच्चे का जीवन इसी बात पर निर्भर करता है कि वह कितनी जल्दी अपने पैरों पर चलना सीख लेता है। अगर उसकी माँ उसे यूँ ही पड़े रहने देती और लात नहीं मारती, तो शायद वह अभी भी वहीं पड़ा रहता और कोई जंगली जानवर उसे अपना शिकार बना लेता।
बच्चों, ठीक इसी तरह से आपके माता-पिता भी कई बार आपको डांटते-डपटते हैं। उस वक़्त यह सब बहुत बुरा लगता है, पर जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं तो कहीं न कहीं यह एहसास होता है कि मम्मी-पापा की डांट की वजह से ही आप जीवन में कुछ बन पाए हैं।"
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







