सुप्रभात बालमित्रों!
19 दिसंबर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 19 दिसंबर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से: "मैं अपने दुश्मनों को नष्ट करता हूँ जब मैं उन्हें अपना दोस्त बना लेता हूँ।" — ‘I destroy my enemies when I make them my friends.’
इस कथन का अर्थ है कि दुश्मनी को खत्म करने का सबसे श्रेष्ठ तरीका बदला लेना नहीं, बल्कि प्रेम, समझ और सद्भाव से उस व्यक्ति का दिल जीत लेना है। जब हम किसी शत्रु के प्रति सकारात्मक व्यवहार रखते हैं, तो उसकी नफरत धीरे-धीरे खत्म हो जाती है और वह विरोधी से सहयोगी बन जाता है। इस प्रकार दुश्मनी स्वतः नष्ट हो जाती है, क्योंकि अब सामने वाला व्यक्ति शत्रु रह ही नहीं जाता। सच्ची विजय वही है जो दिलों को जोड़ती है, न कि जो टकराव और हिंसा बढ़ाए। इसलिए किसी को मित्र बनाकर दुश्मनी समाप्त कर देना सबसे बड़ी जीत और सबसे ऊँचा मानवीय गुण है।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: FAKE : फेक :— नकली, झूठा या जो असली न हो। इसका प्रयोग किसी ऐसी वस्तु, खबर, व्यक्ति या व्यवहार के लिए किया जाता है जो सच न हो या असलियत का दिखावा करता हो।
वाक्य प्रयोग: He bought a fake diamond ring from the market. उसने बाज़ार से नकली हीरे की अंगूठी खरीदी।
जवाब: अंगुलियाँ और अंगूठा।
v अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 19 दिसंबर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1877 – अमेरिकी आविष्कारक थॉमस एडिसन ने फोनोग्राफ का पेटेंट कराया, जो टिन-फॉइल सिलेंडर पर ध्वनि रिकॉर्ड और पुन: उत्पन्न करने वाला पहला व्यावहारिक उपकरण था तथा आधुनिक रिकॉर्डिंग तकनीक का आधार बना।
- 1927 – काकोरी कांड के प्रमुख क्रांतिकारियों पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान तथा ठाकुर रोशन सिंह को ब्रिटिश सरकार ने गोरखपुर, फैजाबाद एवं इलाहाबाद जेलों में फांसी दे दी, जो स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों का प्रतीक बने तथा इस दिन को शहादत दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- 1934 – भारत की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का जयपुर राजस्थान में जन्म हुआ, जो 2007 से 2012 तक पद पर रहीं तथा महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बनीं।
- 1961 – भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय के तहत गोवा में प्रवेश कर लगभग 450 वर्ष पुराने पुर्तगाली उपनिवेशवाद का अंत किया, जिससे गोवा भारत का हिस्सा बना तथा हर वर्ष 19 दिसंबर को गोवा मुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- 1984 – ब्रिटेन और चीन के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत हांगकांग को 1997 में चीन को सौंपने का निर्णय लिया गया तथा 'एक देश, दो प्रणाली' नीति लागू की गई।
- 2008 – भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने जीसैट-7ए संचार उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया, जो भारतीय वायुसेना के लिए समर्पित था तथा सुरक्षित संचार नेटवर्क प्रदान करता है।
v अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “काकोरी कांड के प्रमुख क्रांतिकारियों पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान तथा ठाकुर रोशन सिंह” के बारे में।
काकोरी कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक साहसिक और ऐतिहासिक अध्याय है, जिसे अंजाम देने वाले तीन महान क्रांतिकारी—पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह—स्वतंत्रता की अमर ज्योति हैं। 9 अगस्त 1925 को ब्रिटिश सरकार का धन ले जा रही ट्रेन को रोककर क्रांतिकारियों ने धन जब्त किया ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत किया जा सके। इस घटना ने अंग्रेज़ी सत्ता की नींव हिलाकर रख दी। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल एक महान क्रांतिकारी, कवि और संगठनकर्ता थे। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के प्रमुख नेता थे और “सरफ़रोशी की तमन्ना…” जैसी अमर पंक्तियों के रचयिता थे। बिस्मिल ने युवाओं में देशभक्ति की ज्वाला पैदा की। अशफाक उल्ला खान, बिस्मिल के घनिष्ठ मित्र और अत्यंत निडर क्रांतिकारी थे। उनकी मित्रता सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता का अद्वितीय उदाहरण है। अशफाक उल्ला खान ने अंग्रेजों के सामने झुकने से इनकार कर दिया और फाँसी के फंदे को मुस्कान के साथ स्वीकार किया। ठाकुर रोशन सिंह उम्र में बड़े होने के बावजूद युवाओं जितने ही साहसी और दृढ़निश्चयी थे। हालांकि वे काकोरी कांड में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं थे, फिर भी क्रांतिकारियों को समर्थन देने के आरोप में उन्हें भी फाँसी की सज़ा दी गई। उनका बलिदान इस बात का प्रमाण है कि आज़ादी केवल युवाओं का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का संघर्ष था। 19 दिसंबर 1927 को तीनों महान वीरों को फाँसी दी गई, परंतु उनका त्याग, साहस और बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सदैव अमर रहेगा। बिस्मिल, अशफाक और रोशन सिंह ने अपने प्राणों से सिद्ध किया कि स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर राष्ट्र का सर्वोच्च अधिकार है।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे को मनाये 19 दिसंबर को मनाये जाने वाले “गोवा मुक्ति दिवस” के बारे में:
गोवा मुक्ति दिवस यानी Goa Liberation Day हर वर्ष 19 दिसंबर को मनाया जाता है। इसी दिन 1961 में भारत ने “ऑपरेशन विजय” चलाकर गोवा, दमन और दीव को लगभग 450 वर्षों के पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया था। लेकिन यह आज़ादी केवल सैन्य शक्ति से नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे वर्षों लंबा जनसंघर्ष, आंदोलन और कई महान नेताओं का योगदान था। गोवा की आज़ादी के लिए ट्रिस्टन ब्रागांज़ा कुनहा, डॉ. टी. बी. कुन्हा, गोमंतकीय क्रांतिकारी सेना, गोवा राष्ट्रीय कांग्रेस, स्वतंत्रता सेनानी वसुदेव बळवंत फड़के, और फादर फ्रांसिस्को लुईस गॉम्स जैसे नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही श्रीमती लिलीन कारवो, कुशाभाऊ ठाकरे, और भूमिगत क्रांतिकारियों ने भी आंदोलन को तेज़ किया। इन नेताओं ने गोवा में पुर्तगाली दमन के खिलाफ आवाज़ उठाई, जनता को संगठित किया और स्वतंत्रता की लौ जलाए रखी। अंततः भारत सरकार के प्रयासों और तत्कालीक प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के निर्णय से भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना ने संयुक्त रूप से कार्रवाई कर गोवा को स्वतंत्र कराया। इस तरह गोवा मुक्ति दिवस न केवल सैन्य विजय का प्रतीक है, बल्कि उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के साहस, संघर्ष और बलिदान का सम्मान भी है, जिन्होंने गोवा को स्वाधीनता दिलाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “नम्र बनो कठोर नहीं।”
एक चीनी संत थे। वह बहुत वृद्ध थे। जब उन्हें लगा कि उनका अंतिम समय निकट है, तो उन्होंने अपने सभी भक्तों और शिष्यों को अपने पास बुलाया। उनके आने पर संत ने कहा, “मेरे बच्चों, जरा मेरे मुंह के अंदर देखकर बताओ कि कितने दाँत बचे हैं?” एक-एक करके सभी शिष्यों ने उनके मुंह में झाँककर देखा और विनम्रता से कहा, “गुरुदेव, आपके तो सारे दाँत कई वर्षों पहले ही गिर चुके हैं।” संत ने मुस्कुराते हुए पूछा, “तो क्या मेरी जीभ अब भी है?” सभी ने एक साथ उत्तर दिया, “हाँ गुरुदेव, आपकी जीभ तो वैसी ही है।” संत ने गंभीर स्वर में कहा, “सोचो, जीभ जन्म से मेरे साथ है। दाँत जीभ से बहुत बाद में आए। नियम के अनुसार बाद में आने वाले को पहले नहीं जाना चाहिए था। लेकिन यहाँ उल्टा हुआ—दाँत पहले चले गए और जीभ आज भी है। ऐसा क्यों?” शिष्य चुपचाप संत को देखने लगे। संत बोले— “दाँत कठोर थे, इसलिए वे टूटकर समाप्त हो गए। जीभ नरम थी, इसलिए वह आज तक सुरक्षित है। कठोरता हमेशा टूट जाती है, जबकि नम्रता टिक जाती है। जो लोग जीवन में कठोर, घमंडी और अहंकारी बनते हैं, वे संबंध तोड़ लेते हैं और अकेले रह जाते हैं। महक तो नम्रता में होती है, वही जीवन को लंबा, शांत और मधुर बनाती है।” संत ने अंतिम बात कहते हुए सभी के हृदयों को छू लिया— “इसलिए मेरे बच्चों, यदि देर तक जीना चाहते हो, लोगों के दिलों में भी और इस संसार में भी—तो नम्र बनो, कठोर नहीं। कठोरता मनुष्य को तोड़ देती है, पर नम्रता उसे अमर कर देती है।” यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में सफलता, शांति और स्थायित्व कठोरता से नहीं, बल्कि नम्रता और कोमलता से प्राप्त होते हैं।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







