सुप्रभात बालमित्रों!
9 अक्टूबर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 9 अक्टूबर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है,
आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे,
नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
आपके अपने लोग आपकी तकलीफ़ों में हमेशा साथ खड़े रहते हैं।
your own people always stand with you at the time of problems.
जब जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, तो हमें सबसे अधिक सहारे की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में, हमारे अपने लोग - हमारे परिवार, दोस्त, और करीबी - हमारे साथ खड़े रहते हैं और हमें संबल प्रदान करते हैं। यह कथन इस सच्चाई को उजागर करता है कि हमारे अपने लोग ही हमारे सबसे बड़े समर्थक होते हैं।
जब हम किसी समस्या का सामना करते हैं, तो हमारे अपने लोग हमें मानसिक और भावनात्मक समर्थन देते हैं। वे हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि हम अकेले नहीं हैं और हमारे पास किसी भी चुनौती का सामना करने की शक्ति है। उनके साथ होने से हमें आत्मविश्वास मिलता है और हम कठिनाइयों का सामना करने के लिए अधिक सक्षम महसूस करते हैं।
कई बार, हमारे अपने लोग हमारे लिए त्याग भी करते हैं। वे अपनी सुविधाओं और खुशियों को त्याग कर हमारी मदद करते हैं। उनका यह निस्वार्थ प्रेम और समर्पण हमें यह एहसास दिलाता है कि हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमारे जीवन में ऐसे लोग हैं। इसलिए, हमें अपने लोगों की कद्र करनी चाहिए और उनके साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाना चाहिए।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: TALES : टेल्स का अर्थ होता है कथाएँ या कहानियाँ।
वाक्य प्रयोग: Children love listening to fairy tales. बच्चों को परियों की कहानियाँ सुनना बहुत पसंद होता है।
उत्तर – गुड़िया।
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 9 अक्टूबर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1708 – महान मराठा सरदार बलाजी विश्वनाथ को मराठा साम्राज्य का पहला पेशवा यानी प्रधान मंत्री नियुक्त किया गया। उन्होंने मराठा साम्राज्य की प्रशासनिक नींव मजबूत की और पेशवाशाही युग की शुरुआत की।
- 1771 – डेनमार्क दुनिया का पहला ऐसा देश बना जहाँ प्रेस यानी पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कानूनी मान्यता दी गई। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम था।
- 1874: स्विट्ज़रलैंड के बर्न में 22 देशों ने मिलकर यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (UPU) की स्थापना की। इसी कारण 9 अक्टूबर को हर वर्ष विश्व डाक दिवस यानी World Post Day मनाया जाता है।
- 1888: दिल्ली में इरविन अस्पताल की स्थापना हुई थी, जिसका नाम बाद में बदलकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल (LNJP Hospital) रखा गया।
- 1962 – अफ्रीकी देश युगांडा को ब्रिटेन से स्वतंत्रता मिली। यह दिन युगांडा के इतिहास में आज़ादी के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
- 2006 - उत्तर कोरिया ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, जिससे विश्व राजनीति में तनाव बढ़ गया और संयुक्त राष्ट्र ने उस पर प्रतिबंध लगाए।
- 2012: पाकिस्तानी तालिबान ने मलाला यूसुफजई पर हमला किया, जो शिक्षा अधिकार कार्यकर्ता हैं। वह इस हमले से बच गईं और बाद में बालिका शिक्षा की वैश्विक प्रतीक बनीं। 2014 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे बालिका अधिकार कार्यकर्ता “मलाला यूसुफ़ज़ई” के बारे में।
मलाला यूसुफ़ज़ई पाकिस्तान की एक साहसी और निडर बालिका अधिकार कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने लड़कियों की शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष कर पूरी दुनिया में प्रेरणा का स्रोत बन गईं। उनका जन्म 12 जुलाई 1997 को पाकिस्तान के स्वात घाटी (मिंगोरा) में हुआ था। बचपन से ही वे पढ़ाई में रुचि रखती थीं और उनके पिता ज़ियाउद्दीन यूसुफ़ज़ई एक स्कूल चलाते थे, जिन्होंने मलाला को शिक्षा के महत्व को समझाया।
जब तालिबान ने पाकिस्तान के स्वात क्षेत्र में लड़कियों के स्कूल जाने पर प्रतिबंध लगाया, तब मलाला ने अपने साहसिक विचारों को बीबीसी उर्दू ब्लॉग के माध्यम से व्यक्त किया। उन्होंने शिक्षा को हर लड़की का मौलिक अधिकार बताया। उनकी इस खुली आवाज़ से कट्टरपंथी नाराज़ हो गए और 9 अक्टूबर 2012 को तालिबान आतंकवादियों ने उन पर गोली चला दी। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मलाला बच गईं और उपचार के बाद शिक्षा और शांति के संदेश को और अधिक सशक्त रूप से फैलाने लगीं।
मलाला ने अपनी संस्था Malala Fund के माध्यम से विश्वभर में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने का कार्य किया। 2014 में, मात्र 17 वर्ष की आयु में, उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया — वह अब तक की सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता बनीं।
मलाला आज पूरी दुनिया के लिए साहस, शिक्षा और मानवाधिकारों की प्रतीक हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि “एक बच्चा, एक शिक्षक, एक किताब और एक पेन दुनिया को बदल सकते हैं।”
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 9 अक्टूबर को मनाये जाने वाले “विश्व डाक दिवस” के बारे में:
विश्व डाक दिवस हर साल 9 अक्टूबर को मनाया जाता है। यह दिन 1874 में स्विट्जरलैंड के बर्न में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (UPU) की स्थापना की वर्षगांठ के रूप में मनाया जाता है। 9 अक्टूबर 1874 को 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे जनरल पोस्टल यूनियन का गठन हुआ। बाद में इसका नाम बदलकर यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन कर दिया गया। यूपीयू की स्थापना वैश्विक संचार क्रांति की शुरुआत थी, जिसने दुनिया भर में पत्रों और पार्सलों के आदान-प्रदान को सुगम बनाया।
इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य डाक सेवाओं की उपयोगिता और उनके योगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना है, जो लोगों और व्यवसायों के रोजमर्रा के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विश्व डाक दिवस पर विभिन्न देशों में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें डाकघरों, मेल केंद्रों और डाक संग्रहालयों में खुले दिनों का आयोजन, नए डाक उत्पादों और सेवाओं का परिचय, और डाक सेवाओं के महत्व पर जागरूकता फैलाने के लिए पोस्टर और डिजाइन का वितरण शामिल है। इस दिन को मनाने का उद्देश्य डाक सेवाओं के महत्व को रेखांकित करना और उनके योगदान को सम्मानित करना है।
अत्यंत गरीब परिवार का एक बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में किसी दूसरे शहर जाने के लिए रेलगाड़ी से सफ़र कर रहा था। घर में कभी-कभार ही सब्जी बनती थी, इसलिए उसने रास्ते में खाने के लिए सिर्फ रोटियां ही रखी थीं। आधा रास्ता गुजर जाने के बाद उसे भूख लगने लगी, और वह टिफिन में से रोटियां निकाल कर खाने लगा। उसके खाने का तरीका कुछ अजीब था, वह रोटी का एक टुकड़ा लेता और उसे टिफिन के अंदर कुछ ऐसे डालता मानो रोटी के साथ कुछ और भी खा रहा हो, जबकि उसके पास तो सिर्फ रोटियां थीं। उसकी इस हरकत को आस-पास के यात्री देख कर हैरान हो रहे थे। वह युवक हर बार रोटी का एक टुकड़ा लेता और झूठमूठ का टिफिन में डालता और खाता। सभी सोच रहे थे कि आखिर वह युवक ऐसा क्यों कर रहा था।
आखिरकार एक व्यक्ति से रहा नहीं गया और उसने उससे पूछ ही लिया, “भैया, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? तुम्हारे पास सब्जी तो है ही नहीं, फिर रोटी के टुकड़े को हर बार खाली टिफिन में डालकर ऐसे खा रहे हो मानो उसमें सब्जी हो।”
तब उस युवक ने जवाब दिया, “भैया, इस खाली टिफिन में सब्जी नहीं है, लेकिन मैं अपने मन में यह सोच कर खा रहा हूँ कि इसमें बहुत सारा अचार है। मैं अचार के साथ रोटी खा रहा हूँ।”
उस व्यक्ति ने फिर पूछा, “खाली टिफिन में अचार सोच कर सूखी रोटी को खा रहे हो तो क्या तुम्हें अचार का स्वाद आ रहा है?”
“हाँ, बिल्कुल आ रहा है,” युवक ने जवाब दिया। “मैं रोटी के साथ अचार सोचकर खा रहा हूँ और मुझे बहुत अच्छा भी लग रहा है।”
उसकी इस बात को आसपास के यात्रियों ने भी सुना, और उन्हीं में से एक व्यक्ति बोला, “जब सोचना ही था तो तुम अचार की जगह मटर पनीर सोचते, शाही गोभी सोचते… तुम्हें इनका स्वाद मिल जाता। तुम्हारे कहने के मुताबिक तुमने आचार सोचा तो आचार का स्वाद आया, तो और स्वादिष्ट चीजों के बारे में सोचते तो उनका स्वाद आता। सोचना ही था तो भला छोटा क्यों सोचे? तुम्हें तो बड़ा सोचना चाहिए था।”
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमारे विचारों की शक्ति बहुत बड़ी होती है। जब हम बड़े और सकारात्मक सोचते हैं, तो हमारे जीवन में भी बड़े और सकारात्मक बदलाव आते हैं। इसलिए, हमेशा बड़ा सोचो और अपने सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ो।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







