सुप्रभात बालमित्रों!
28 सितम्बर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 28 सितम्बर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है,
आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे,
नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
विश्वास और ताकत सफलता की एकमात्र शर्तें हैं।
Faith and strength are the only conditions of success
विश्वास किसी भी लक्ष्य को पाने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है। जब हम अपने आप पर विश्वास करते हैं, तो अपनी क्षमताओं को पहचानते हैं और कठिनाइयों का सामना करने की हिम्मत जुटाते हैं। विश्वास हमें सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने और लगातार प्रयास करने के लिए प्रेरित करता है।
ताकत केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक शक्ति भी होती है। यह हमें चुनौतियों का सामना करने, बाधाओं को पार करने और अपने लक्ष्यों तक पहुँचने में सक्षम बनाती है।
सफलता एक जटिल प्रक्रिया है। इसमें अवसर, कौशल और समर्पण जैसे कई तत्व शामिल होते हैं। विश्वास और ताकत के साथ-साथ अपने कौशल को विकसित करना, अवसरों का सही उपयोग करना और लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण रखना, सफलता के लिए आवश्यक है। यदि आपके पास अडिग विश्वास और अटूट ताकत है, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: READER : रीडर : पाठक या पढ़ने वाला।
वाक्य प्रयोग: The reader enjoyed the story thoroughly. पाठक ने कहानी का पूरा आनंद लिया।
जवाब : वचन
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 28 सितम्बर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1542: पुर्तगाली नाविक जुआन रोड्रिग्ज कैब्रियो कैलिफोर्निया के सैन डिएगो खाड़ी में उतरे, जो यूरोपियों द्वारा इस क्षेत्र की पहली खोज थी।
- 1781: अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यॉर्कटाउन की घेराबंदी शुरू हुई, जो ब्रिटिश सेना के आत्मसमर्पण का कारण बनी।
- 1837: बहादुर शाह द्वितीय ने अपने पिता अकबर द्वितीय की मृत्यु के बाद दिल्ली का शासन संभाला और वह मुग़लों के अंतिम सम्राट बने।
- 1838: भारत के समाज सुधारक और शिक्षाविद् केशव चंद्र सेन का जन्म हुआ, जिन्होंने ब्रह्म समाज को नई दिशा दी और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा दिया।
- 28 सितंबर 1907 को महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत के पंजाब में लायलपुर जिले के बंगा गाँव में हुआ था। उन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया और 23 वर्ष की आयु में 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में उन्हें फांसी दे दी गई।
- 1928: अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने पेनिसिलिन की खोज की, और एंटीबायोटिक्स युग की शुरुआत की। जो चिकित्सा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम था। फ्लेमिंग ने अपने प्रयोगशाला में अनुभव करते हुए देखा कि एक विशेष प्रकार के फंगस - पेनिसिलियम नोटैटम ने बैक्टीरिया की वृद्धि को रोक दिया। इस खोज ने चिकित्सा क्षेत्र में क्रांति ला दी और लाखों लोगों की जान बचाई। इसके लिए उन्हें 1945 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- 1929 : भारत की मशहूर पार्श्व गायिका लता मंगेशकर का जन्म हुआ था। उन्हें स्वर कोकिला के नाम से भी जाना जाता है।
- 2008: स्पेसएक्स ने फाल्कन 1 रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया, जो पहला निजी रॉकेट था जो कक्षा में पहुँचा, और अंतरिक्ष अनुसंधान में निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ाया।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे महान क्रांतिकारी “शहीद भगत सिंह” के बारे में।
भगत सिंह भारत के महान क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्होंने अपने साहस, देशभक्ति और बलिदान से स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा गाँव (अब पाकिस्तान) में हुआ था। बचपन से ही उनके हृदय में देशभक्ति की भावना थी। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने अंग्रेज़ों के अत्याचारों के खिलाफ लड़ने का संकल्प लिया।
भगत सिंह ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के माध्यम से क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। 1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए उन्होंने अपने साथियों के साथ ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या की। 1929 में उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय विधान सभा यानी सेंट्रल असेंबली में बम फेंका, जिसका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों को चेतावनी देना और देशवासियों में जोश भरना था। भगत सिंह को उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ अंग्रेज़ों ने गिरफ्तार किया और 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में फाँसी दे दी। उस समय उनकी उम्र मात्र 23 वर्ष थी।
भगत सिंह का जीवन साहस, त्याग और देशभक्ति का प्रतीक है। वे आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा बने हुए हैं और उनका नाम सदा अमर रहेगा।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 28 सितम्बर को मनाये जाने वाले “विश्व रेबीज दिवस” के बारे में:
हर साल 28 सितंबर को रेबीज और इसे रोकने के तरीकों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 'विश्व रेबीज दिवस' मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत साल 2007 में ग्लोबल अलायंस फॉर रेबीज कंट्रोल (GARC) द्वारा की गई थी, जो दुनिया भर में रेबीज की रोकथाम के लिए काम करने वाला एक समूह है। 28 सितंबर की तारीख को वैज्ञानिक लुई पाश्चर की पुण्यतिथि के सम्मान में चुना गया था जिन्होंने पहली सफल रेबीज वैक्सीन विकसित की थी।
यह सब शुरू हुआ एक छोटे से लड़के, जोसेफ मेइस्टर के साथ। 1885 में, जब वो महज 9 साल का था, तो एक पागल कुत्ते ने उसे काट लिया। उस समय, पागल कुत्ते के काटने का मतलब था कि आपकी जिंदगी अब ज्यादा लंबी नहीं रह गई। ऐसी स्थिति में उसकी मां को कहीं दूर से उड़ती हुई खबर मिली की एक साइंटिस्ट है जो पागल कुत्ता को पालता है और उनके ब्लड से इंजेक्शन बनाता है। यह इंजेक्शन इतना अच्छा है कि इसे लगाने से लोग रेबीज की बीमारी से बच जाते हैं। इस अफवाह में जोसेफ मेइस्टर की मां की उम्मीद जागी। उसने सोचा कि चलो कुछ नहीं लेकिन अगर मेरा बेटा बच जाएगा तो क्या दिक्कत है। वह पेरिस चली गई। जब वह पागल कुत्ते वाले साइंटिस्ट से मिली तो साइंटिस्ट भी काफी खुश हुए। क्योंकि उन्होंने रबीज का इंजेक्शन तो बना लिया था लेकिन उसका ह्मूयन ट्रायल करने के लिए कोई इंसान नहीं था। लुई पाश्चर ने जोसेफ को एक विशेष तरह का इंजेक्शन दिया। यह इंजेक्शन इतना असरदार था कि जोसेफ रेबीज से बच गया। इस घटना ने दुनिया को एक नई उम्मीद दे दी।
विश्व रेबीज दिवस का मुख्य लक्ष्य लोगों को रेबीज के खतरों के बारे में सूचित करना और इसके प्रसार को रोकने के लिए कार्रवाई को बढ़ावा देना है। रेबीज एक जानलेवा बीमारी है जो ज़्यादातर लोगों को कुत्तों के काटने से होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य स्वास्थ्य समूह इस दिन का समर्थन करते हैं।
~ भगत सिंह के बचपन से जुड़ा प्रेरक प्रसंग! पाँच वर्ष की बाल अवस्था में ही भगत सिंह के खेल भी अनोखे थे। वह अपने साथियों को दो टोलियों में बाँट देता था और वे परस्पर एक-दूसरे पर आक्रमण करके युद्ध का अभ्यास किया करते। भगत सिंह के हर कार्य में उसके वीर, धीर और निर्भीक होने का आभास मिलता था।
एक बार सरदार किशन सिंह इस बालक को लेकर अपने मित्र श्री नन्द किशोर मेहता के पास उनके खेत पर गए। दोनों मित्र बातों में लग गए और बालक भगत अपने खेल में लग गया। नन्द किशोर मेहता का ध्यान भगत सिंह के खेल की ओर आकृष्ट हुआ। भगत सिंह मिट्टी के ढेरों पर छोटे-छोटे तिनके लगाए जा रहा था। उनके इस कार्य को देखकर नन्द किशोर मेहता बड़े स्नेहभाव से बालक भगत सिंह से बातें करने लगे- “तुम्हारा क्या नाम है?” बालक ने उत्तर दिया “भगत सिंह।” “तुम क्या कर रहे हो?” “मैं बंदूकें बो रहा हूं।” बालक भगत सिंह ने बड़े गर्व से उत्तर दिया। “वह क्यों?” “अपने देश को स्वतंत्र कराने के लिए।”
श्री नन्द किशोर मेहता राष्ट्रीय विचारों से ओत-प्रोत राष्ट्रभक्त व्यक्ति थे। उन्होंने बालक भगत सिंह को बड़े स्नेहपूर्वक अपनी गोदी में उठा लिया। मेहता जी उसकी बातों से अत्यधिक प्रभावित हुए और सरदार किशन सिंह से बोले, “भाई! तुम बड़े भाग्यवान हो, जो तुम्हारे घर में ऐसे होनहार व विलक्षण बालक ने जन्म लिया है। मेरा इसे हार्दिक आशीर्वाद है, यह बालक संसार में तुम्हारा नाम रोशन करेगा। देशभक्तों में इसका नाम अमर होगा।” वास्तव में समय आने पर मेहता की यह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई।
यह कहानी यह बताती है कि बचपन से ही बच्चों में महान बनने की संभावनाएं होती हैं, और हमें उनकी क्षमताओं को पहचानकर उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। भगत सिंह की छोटी उम्र में ही देश के प्रति उनका समर्पण और स्वतंत्रता के लिए उनकी दृढ़ता प्रेरणादायक है।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “महान उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय” के बारे में।
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय भारतीय साहित्य के महान नायक और उपन्यासकार थे। उनका जन्म 15 सितंबर 1876 को बंगाल के देबग्राम गाँव में हुआ था। वे अपने समय के समाज, संस्कृति और मानवीय भावनाओं को अपने लेखन में बड़ी सजीवता से प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं।
शरतचंद्र ने सामाजिक बंधनों, परिवार और महिलाओं की स्थिति जैसे विषयों को अपने उपन्यासों में प्रभावशाली ढंग से उठाया। उनके प्रमुख उपन्यासों में ‘देवदास’, ‘पलाशीर परीक्षित’, ‘श्रीकांत’ और ‘चरित्रहीन’ शामिल हैं। उन्होंने सरल और भावपूर्ण भाषा में मानवीय संवेदनाओं को प्रस्तुत किया, जिससे पाठक उनकी कहानियों में आसानी से डूब जाते हैं।
उनका लेखन न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि समाज के कई पहलुओं पर सोचने और संवेदनशील बनने की प्रेरणा भी देता है। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का निधन 16 जनवरी 1938 को हुआ, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी भारतीय साहित्य में अमर हैं।
सारांश: शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने समाज और मानव मन के विविध पहलुओं को अपनी रचनाओं में व्यक्त कर भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। उनका साहित्य आज भी पाठकों के लिए प्रेरणा और शिक्षा का स्रोत है।







