सुप्रभात बालमित्रों!
23 सितम्बर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 23 सितम्बर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है,
आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे,
नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
“जिज्ञासु बनें। खूब पढ़ें। नई चीज़ों को आज़माएँ। जिसे लोग बुद्धिमत्ता कहते हैं, वह जिज्ञासा पर ही निर्भर है।
Be curious. Read widely. Try new things. What people call intelligence just boils down to curiosity.”
यह वाक्य बताता है कि जिज्ञासा केवल एक गुण नहीं, बल्कि हर सीख-ने की प्रक्रिया की शुरुआत है। जिज्ञासा वह चिंगारी है जो हमें अनजानी बातों तक ले जाती है; वही हमें प्रश्न पूछने, तुलना करने और असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। बुद्धिमत्ता केवल किताबों में जमा जानकारी नहीं है — वह उस जानकारी को समझने, प्रयोग में लाने और नए प्रश्न खड़े करने की क्षमता है। जब हम पढ़ते हैं, अनुभव करते हैं और प्रयोग करते हैं, तब हमारी समझ गहरी होती है और समाधान बनाने की ताकत बढ़ती है।
छोटी-छोटी आदतें जिज्ञासा को ठोस रूप देती हैं: विविध विषयों पर पढ़ना, रोज़ एक नया सवाल पूछना, छोटे प्रयोग करना और अपने अनुभवों से निश्चयपूर्वक सीखना। जिज्ञासा ही वह अभ्यास है जिससे तार्किक सोच, रचनात्मकता और दीर्घकालीन समझ बनती है। इसलिए जिज्ञासु बनिए — यह न सिर्फ़ आपके ज्ञान को बढ़ाएगा, बल्कि आपको जिंदादिल, स्वतंत्र और कुशल बनाएगा।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: NECESSARY (नेसेसरी) का अर्थ होता है – आवश्यक, ज़रूरी या अनिवार्य। इसका प्रयोग तब किया जाता है जब किसी वस्तु, कार्य या शर्त के बिना कोई काम पूरा नहीं हो सकता या उसका महत्व अत्यधिक हो।
वाक्य प्रयोग: Food is necessary for life. भोजन जीवन के लिए आवश्यक है।
सही जवाब - चना
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 23 सितम्बर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 63 ईसा पूर्व: रोमन साम्राज्य के पहले सम्राट ऑगस्टस का जन्म हुआ, जिन्होंने रोमन गणराज्य को साम्राज्य में बदलकर पक्स रोमाना यानी रोमन शांति युग की स्थापना की।
- 1846: फ्रांसीसी खगोलशास्त्री उर्सिन ले वेरियर ने गणितीय गणनाओं के आधार पर नेपच्यून ग्रह की स्थिति की भविष्यवाणी की, जो उरानस की कक्षा में असामान्यताओं पर आधारित थी। उसी दिन जर्मन खगोलशास्त्री जोहान गाले ने इसे दूरबीन से देखकर पुष्टि की। जिसने आधुनिक विज्ञान की नींव मजबूत की और सौर मंडल की समझ बढ़ाई।
- 1863: काबुल, अफगानिस्तान में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानी और अहीरवाल क्षेत्र के नायक राव तुलाराम का निधन हुआ। जिन्हें हरियाणा में वीर एवं शहीदी दिवस के रूप में याद किया जाता है।
- 1908: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म बिहार के बेगूसराय जिले में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि थे, जिनकी रचनाएँ जैसे "रश्मिरथी", "उर्वशी" और "परशुराम की प्रतीक्षा" राष्ट्रीयता और सामाजिक न्याय से प्रेरित हैं।
- 2009: इसरो ने ओशनसैट-2 और अन्य उपग्रहों छह अन्य नैनो-उपग्रहों को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया। यह प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा से हुआ। जिसने समुद्री निगरानी और भारत की अंतरिक्ष क्षमता को बढ़ाया।
- 2018: आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू हुई, जो दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है और यह गरीब परिवारों को प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा प्रदान करती है।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’” के बारे में।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आधुनिक हिंदी साहित्य के तेजस्वी और ओजस्वी कवि थे। उनका जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया गाँव में हुआ था। बचपन से ही उनमें राष्ट्रप्रेम और संघर्ष की ज्वाला थी। उनकी कविताएँ जनता को जागृत करने वाली और स्वतंत्रता आंदोलन में नई ऊर्जा भरने वाली सिद्ध हुईं।
दिनकर जी की रचनाओं में ओज, शौर्य और वीरता के साथ-साथ करुणा और सौंदर्य भी मिलता है। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में रश्मिरथी, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, हुंकार और कुरुक्षेत्र प्रमुख हैं। रश्मिरथी में उन्होंने महाभारत के महान योद्धा कर्ण का चित्रण किया है, जबकि उर्वशी के लिए उन्हें 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले उनकी कविताएँ अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध जोश जगाने का कार्य करती थीं, और स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सामाजिक चेतना, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक गौरव को अपने लेखन का विषय बनाया। उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ी गहरी समझ और राष्ट्रीय एकता का भाव स्पष्ट झलकता है।
अपने ओजस्वी काव्य और राष्ट्रप्रेमपूर्ण साहित्य के कारण ही उन्हें “राष्ट्रकवि” की उपाधि मिली। 24 अप्रैल 1974 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी कविताएँ आज भी पाठकों के हृदय में उत्साह, प्रेरणा और स्वाभिमान की ज्योति प्रज्वलित करती हैं।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 23 सितम्बर को मनाये जाने वाले “अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस” के बारे में:
अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस यानी International Day of Sign Languages हर साल 23 सितंबर मनाया जाता है। यह दिन उन लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जो सुन या बोल नहीं पाते और संवाद के लिए सांकेतिक भाषा पर निर्भर रहते हैं। सांकेतिक भाषा वह माध्यम है जिसमें हाथों के इशारों, उँगलियों के संकेतों और शरीर के हाव-भावों के द्वारा भावनाएँ और विचार व्यक्त किए जाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासभा की घोषणा के बाद 23 सितंबर 2018 को पहली बार यह दिवस मनाया गया। इस तिथि को चुनने का विशेष कारण यह है कि 23 सितंबर 1951 को विश्व बधिर संघ (World Federation of the Deaf – WFD) की स्थापना हुई थी। यह संघ विश्वभर में लगभग 70 मिलियन यानी लगभग 7 करोड़ बधिर लोगों के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करता है। इनमें से लगभग 80% लोग विकासशील देशों में रहते हैं। वर्तमान समय में दुनिया भर में बधिर समुदाय 300 से अधिक विभिन्न सांकेतिक भाषाओं का प्रयोग करते हैं।
इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य सांकेतिक भाषा के महत्व के प्रति जागरूकता फैलाना और बधिर लोगों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करना है। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भाषा और संस्कृति के साथ जीने और संवाद करने का अधिकार है।
लोहे की दुकान में अपने पिता के साथ काम कर रहा एक नन्हा बालक अचानक अपने पिता से पूछ बैठा – “पिताजी, इस दुनिया में मनुष्य की क्या कीमत होती है?”
पिता चौंक गए। इतने छोटे से बच्चे के मुख से ऐसा गूढ़ प्रश्न सुनकर वे कुछ क्षण मौन रहे। फिर मुस्कुराकर बोले – “बेटे, मनुष्य अनमोल है। उसकी कीमत आँकी नहीं जा सकती।”
बालक ने फिर मासूमियत से प्रश्न किया – “तो क्या सब मनुष्य समान रूप से अनमोल हैं? फिर कोई अमीर और कोई गरीब क्यों है? किसी की इज़्ज़त ज़्यादा और किसी की कम क्यों होती है?”
यह प्रश्न सुनकर पिता गंभीर हो गए। उन्होंने स्टोर से लोहे की एक छड़ मंगवाई और पूछा – “बोलो, इसकी कीमत कितनी होगी?” बालक बोला – “लगभग 200 रुपये।” पिता ने समझाते हुए कहा – “यदि मैं इस छड़ से छोटे-छोटे कील बना दूँ, तो इसकी कीमत लगभग 1000 रुपये हो जाएगी। और यदि यही लोहा घड़ियों के स्प्रिंग बनाने में इस्तेमाल हो, तो इसकी कीमत हज़ारों गुना बढ़ जाएगी।”
इसके बाद पिता ने बड़े स्नेह से कहा – “बेटे, ठीक यही बात मनुष्य पर भी लागू होती है। उसकी कीमत इस पर निर्भर नहीं करती कि वह अभी क्या है, बल्कि इस पर कि वह अपने प्रयासों और मेहनत से अपने आप को क्या बना लेता है। जैसे लोहा साधारण छड़ होकर भी महान उपयोगों में आकर अनमोल हो सकता है, वैसे ही इंसान भी अपनी क्षमताओं और गुणों को निखारकर महान बन सकता है।”
बालक अब समझ चुका था कि असली मूल्य धन-दौलत में नहीं, बल्कि अपने कौशल, परिश्रम और चरित्र को विकसित करने में है। यह कहानी हमें सिखाती है कि मनुष्य की कीमत उसकी भौतिक संपत्ति से नहीं आँकी जाती। उसकी असली कीमत उसकी प्रतिभा, मेहनत, ईमानदारी और मानवता से तय होती है। जैसे साधारण लोहे को गढ़कर अनमोल वस्तुएँ बनाई जा सकती हैं, वैसे ही मनुष्य अपनी योग्यता और आत्मविश्वास से स्वयं को ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







