सुप्रभात बालमित्रों!
21 नवम्बर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 21 नवम्बर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
"शिक्षक द्वार खोलते हैं; लेकिन प्रवेश आपको स्वयं ही करना होता है।
Teachers open the door; you enter by yourself."
शिक्षक हमारे जीवन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे हमारे मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत और ज्ञान के दीपक होते हैं। शिक्षक हमें सही दिशा दिखाते हैं, ज्ञान का द्वार खोलते हैं और हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने में सहायता करते हैं। लेकिन उस द्वार से भीतर प्रवेश करना, अर्थात सीखने का वास्तविक प्रयास करना, हमारी अपनी जिम्मेदारी होती है। सच्ची शिक्षा तभी सार्थक होती है जब हम स्वयं प्रयास करें, अपने लक्ष्य के प्रति अनुशासित और समर्पित रहें। शिक्षक हमारे भीतर जिज्ञासा की ज्योति प्रज्वलित करते हैं, परंतु उस ज्योति को प्रखर बनाए रखना हमारी आत्म-प्रेरणा, लगन और निरंतर प्रयास पर निर्भर करता है जो हमें आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और सशक्त व्यक्ति बनने की प्रेरणा देता है।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: DIALOGUE : डायलाग:“संवाद”, “बातचीत” या “वार्तालाप”। यह दो या अधिक व्यक्तियों के बीच विचारों, भावनाओं या सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। फिल्मों, नाटकों, कहानियों और दैनिक जीवन में पात्रों के बीच की बातचीत को व्यक्त करने के लिए “डायलॉग” शब्द का प्रयोग किया जाता है।
वाक्य प्रयोग: The teacher encouraged open dialogue in the classroom. शिक्षक ने कक्षा में खुला संवाद करने के लिए प्रोत्साहित किया।
उत्तर : बटन
v अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 21 नवम्बर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1872: कवि और स्वतंत्रता सेनानी केसरी सिंह बारहट का जन्म शाहपुरा, राजस्थान में हुआ, जो राजस्थान केसरी के नाम से प्रसिद्ध हुए और जिन्होंने 'चेतावनी रा चुंगट्या' जैसी रचनाओं के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन को प्रेरित किया।
- 1947: आजादी के बाद देश में पहली बार डाक टिकट 'जय हिन्द' जारी किया गया, जो 3½ आने लगभग 14 पैसे मूल्य का था, भारतीय तिरंगे को दर्शाता था।
- 1962: भारत-चीन सीमा विवाद के दौरान चीन ने एकपक्षीय संघर्ष विराम का ऐलान किया, जिसके तहत उसने पूर्वी क्षेत्र से पीछे हटने की घोषणा की लेकिन अक्साई चिन पर कब्जा बनाए रखा, जिससे युद्ध समाप्ति की ओर बढ़ा।
- 1963: केरल के थुंबा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन TERLS से पहला रॉकेट 'नाइक-अपाचे' छोड़े जाने के साथ ही भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत हुई।
- 1970: प्रसिद्ध भारतीय भौतिक विज्ञानी और नोबेल पुरस्कार विजेता चन्द्रशेखर वेंकट रमन का निधन बेंगलुरु में हुआ, उन्होंने रमन प्रभाव की खोज कर 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार जीता और भारतीय विज्ञान को वैश्विक पहचान दिलाई।
- 1973: ब्रायन और माइकल मैककॉर्मैक नाम के दो भाइयों ने मिस्र और इज़राइल के बीच युद्ध की प्रतिक्रिया के रूप में शांति और आपसी संवाद को बढ़ावा देने के लिए पहली बार विश्व हैलो दिवस मनाने की शुरुआत की।
- 1996: संयुक्त राष्ट्र ने पहला विश्व टेलीविजन मंच आयोजित किया, जहाँ प्रमुख मीडिया हस्तियाँ संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में बदलती दुनिया में टेलीविजन के बढ़ते महत्व पर चर्चा करने और आपसी सहयोग को बढ़ाने के लिए एकत्रित हुईं, जिसके सम्मान में विश्व टेलीविजन दिवस घोषित किया गया।
- 1997: नई दिल्ली में विश्व मत्स्य पालन मंच के गठन के साथ विश्व मत्स्य दिवस की शुरुआत हुई, जबकि भारत में इसे पहली बार 21 नवंबर 2015 को अंतर्राष्ट्रीय मछुआरे संगठन के उद्घाटन के साथ मनाया गया। तब से हर साल 21 नवंबर को विश्व मत्स्य दिवसमनाया जाता है।
v अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “कवि और स्वतंत्रता सेनानी केसरी सिंह बारहट ” के बारे में।
केसरी सिंह बारहट का जन्म 21 नवंबर 1872 ई. को राजस्थान के शाहपुरा रियासत के देवपुरा गाँव में हुआ था। बारहट चारण समाज से ताल्लुक रखते थे और बचपन से ही विद्वत्ता, काव्यशक्ति व सामाजिक–राजनीतिक चेतना से सम्पन्न थे। उन्होंने संस्कृत, बंगला, मराठी, गुजराती सहित इतिहास, दर्शन, खगोलशास्त्र आदि में अध्ययन किया।
स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अनेक रूपों में रहा। उन्होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध क्रांतिकारी आंदोलनों का नेतृत्व किया, जैसे कि चेतावणी रा चुंगट्या नामक डिंगल कविता-संग्रह के माध्यम से मेवाड़ के महाराणा को 1903 में दिल्ली दरबार 1903 में भाग न लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने राजस्थान में “वीर भारत सभा” नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की और अन्य संगठनों जैसे राजस्थान सेवा संघ व राजपूताना‑मध्य भारत सभा के माध्यम से सामाजिक–राजनीतिक जागरूकता फैलाई। साहित्यकार के रूप में उनकी रचनाएँ विशेष उल्लेखनीय हैं — समृद्ध लोकभाषा डिंगल में लिखे उनकी कविताओं ने काव्य एवं क्रांति दोनों का संगम प्रस्तुत किया।
केसरी सिंह बारहट ने न सिर्फ अपने समय में सक्रिय भूमिका निभाई, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा दी उनका निधन 14 अगस्त 1941 ई. को हुआ।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे को मनाये जाने वाले “विश्व टेलीविजन दिवस” के बारे में:
विश्व दूरदर्शन दिवस या विश्व टेलीविज़न डे हर साल 21 नवंबर को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने टेलीविज़न के बढ़ते महत्व और इसके प्रभाव को देखते हुए, साल 1996 में इस दिन को मनाने की घोषणा की थी। साल 1996 में ही संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार विश्व टेलीविज़न फ़ोरम का आयोजन किया था, जिसमें दुनिया भर के मीडिया हस्तियों ने टेलीविज़न के महत्व पर चर्चा की थी।
टेलीविज़न के ज़रिए लोगों की राय को ढाला जा सकता है। टेलीविज़न, सूचना, प्रणाली, और जनमत को प्रभावित करने का एक अहम ज़रिया है। टेलीविज़न, संचार और वैश्वीकरण का प्रतीक है।
भारत में टेलीविज़न की शुरुआत 15 सितंबर, 1959 को हुई थी।तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने इसके पहले प्रसारण का उद्घाटन किया था. दिल्ली में प्रायोगिक प्रसारण के ज़रिए दूरदर्शन की शुरुआत हुई थी। दूरदर्शन विभिन्न प्रमुख आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हुए पूरे विश्व के ज्ञान में वृद्धि करने में मदद करता है। वर्तमान में यह संचार और सूचना के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में उभरा है।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “ज्ञान की प्यास”
यह प्रसंग प्रसिद्ध विद्वान, समाज सुधारक, न्यायाधीश और लेखक महादेव गोविंद रानडे का है, जब वे हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे। उनके पद की ऊँचाई जितनी बड़ी थी, उतनी ही गहरी थी उनके भीतर ज्ञान की प्यास। उन्हें नई-नई भाषाएँ सीखने का अत्यंत शौक था। उन्होंने अनेक भाषाएँ सीख ली थीं, परंतु बँगला भाषा अब तक अधूरी रह गई थी।
एक दिन उन्होंने एक अनोखा उपाय सोचा। उन्होंने एक बंगाली नाई से अपनी हजामत बनवाना शुरू किया। जब नाई अपना काम करता, रानडे उससे बँगला भाषा सीखते रहते। इस तरह उन्होंने धीरे-धीरे बंगला बोलना और समझना सीख लिया। जब यह बात उनकी पत्नी को पता चली, तो वे असंतुष्ट हुईं। उन्होंने कहा, “आप इतने बड़े न्यायाधीश होकर एक नाई से भाषा सीखते हैं? कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा? आपको बँगला सीखनी है तो किसी विद्वान से सीखिए।”
रानडे मुस्कराए और शांत स्वर में बोले — “प्रिय, मैं ज्ञान का प्यासा हूँ। मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं कि शिक्षक कौन है। ज्ञान तो ज्ञान होता है, चाहे वह किसी से भी मिले।” पत्नी यह सुनकर चुप रह गईं, परंतु उनके मन में रानडे के प्रति गहरा सम्मान भर गया।
यह प्रेरक प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चे ज्ञान के साधक के लिए कोई ऊँच-नीच या सामाजिक भेदभाव नहीं होता। जहाँ से भी ज्ञान मिले, उसे ग्रहण कर लेना ही बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। विनम्रता और सीखने की लगन ही सच्ची विद्या का मार्ग प्रशस्त करती है।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!






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