सुप्रभात बालमित्रों!
2 अप्रैल – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 2 अप्रैल है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
"जैसे ही भय आपके करीब आए, उस पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दीजिये।"
"As soon as the fear approaches near, attack and destroy it."
जीवन में भय एक ऐसा शत्रु है जो मन के अंधकार को जन्म देता है। भय के प्रति यह आक्रामक रवैया हमें सिखाता है कि डर को कभी भी पनपने नहीं देना चाहिए। जिस प्रकार एक सैनिक शत्रु को सीमा पर ही रोक देता है, उसी प्रकार हमें भय के मन में प्रवेश करते ही उसका सामना करना चाहिए।
भय एक "विकासशील भावना" है—यदि हम उसकी उपेक्षा करेंगे तो वह विशालकाय रूप ले लेगा। उदाहरण के लिए, यदि किसी छात्र को गणित से डर लगता है और वह उससे बचता रहेगा, तो यह डर उसकी सफलता में बाधक बन जाएगा। परंतु यदि वह पहले दिन से ही गणित का अभ्यास शुरू कर दे, तो धीरे-धीरे भय समाप्त हो जाता है।
महान विचारक स्वामी विवेकानंद ने ठीक ही कहा था—"डर पर विजय पाने का एकमात्र उपाय है उसकी ओर बढ़ते जाना।"
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: VARIABLE : वैरिएबल : परिवर्तनशील यानी बदलने योग्य।
उदाहरण वाक्य : The weather is variable—sometimes hot, sometimes rainy. मौसम परिवर्तनशील होता है—कभी गर्मी, कभी बारिश।
उत्तर - टाईम टेबल।
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 2 अप्रैल की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 2 अप्रैल 1849 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के बाद पंजाब को औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत में मिला लिया। इसे बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत एक नया प्रांत बनाया गया, जिसमें लॉर्ड डलहौजी ने महाराजा दिलीप सिंह को गद्दी से हटाकर यह ऐतिहासिक घोषणा की।
- 2 अप्रैल 1902 को अमेरिका के लॉस एंजिल्स में थॉमस लिंकन टैली ने "इलेक्ट्रिक थियेटर" नाम से दुनिया के पहले स्थायी मोशन पिक्चर थियेटर की शुरुआत की। एक पैसे के टिकट पर दर्शक "द कैप्चर ऑफ द बिडल ब्रदर्स" और "न्यू यॉर्क इन ए ब्लिज़र्ड" जैसी मूक फिल्मों का आनंद ले सकते थे।
- भारत सरकार ने 2 अप्रैल 1970 को असम पुनर्गठन अधिनियम पारित किया, जिसके तहत मेघालय को स्वायत्त राज्य का दर्जा मिला। यह क्षेत्र असम के पर्वतीय जिलों को मिलाकर बनाया गया था और बाद में 21 जनवरी 1972 को पूर्ण राज्य बना।
- 2 अप्रैल 1984 को भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर राकेश शर्मा सोवियत सोयुज T-11 अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष जाने वाले प्रथम भारतीय बने। उन्होंने साल्युत 7 अंतरिक्ष स्टेशन पर 8 दिन बिताए और "सारे जहां से अच्छा" गीत गाकर देश का गौरव बढ़ाया।
- 2 अप्रैल 2011 को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में आयोजित आईसीसी क्रिकेट विश्व कप फाइनल में भारत ने श्रीलंका को 6 विकेट से हराया। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की नाबाद 91 रनों की ऐतिहासिक पारी और गौतम गंभीर के 97 रनों ने भारत को 28 वर्षों बाद विश्व विजेता बनाया।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अप्रैल 2017 को जम्मू-कश्मीर में 9.2 किमी लंबी चेनानी-नाशरी सड़क सुरंग राष्ट्र को समर्पित की। यह देश की सबसे लंबी सड़क सुरंग है जो जम्मू से श्रीनगर की यात्रा का समय 2 घंटे कम करती है और पहाड़ी इलाकों में सुरक्षित यातायात सुनिश्चित करती है।
विंग कमांडर राकेश शर्मा का जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था। उनकी शिक्षा हैदराबाद के सेंट जॉर्ज ग्रामर स्कूल और निजाम कॉलेज में हुई। बचपन से ही विज्ञान और उड्डयन में रुचि होने के कारण उन्होंने 1966 में भारतीय वायु सेना (IAF) में पायलट के रूप में करियर शुरू किया।
1971 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने मिग-21 लड़ाकू विमान उड़ाकर वीरता दिखाई और कई सफल मिशन पूरे किए। उनकी असाधारण नेतृत्व क्षमता और तकनीकी दक्षता के कारण 1982 में भारत सरकार ने उन्हें सोवियत-भारत संयुक्त अंतरिक्ष मिशन के लिए चुना। 2 अप्रैल 1984 को राकेश शर्मा सोयुज T-11 अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले प्रथम भारतीय बने।
वह सोवियत अंतरिक्ष स्टेशन साल्युत 7 पर 8 दिन रहे, जहाँ उन्होंने भारतीय वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम दिया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सवाल "अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है?" पर उनका मशहूर जवाब — "सारे जहाँ से अच्छा" — ने देशभक्ति की नई भावना जगाई। इस उपलब्धि के लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक अशोक चक्र (1984) से नवाजा गया। सोवियत संघ ने भी उन्हें "हीरो ऑफ सोवियत यूनियन" का खिताब दिया।
वायु सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद शर्मा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) से जुड़े रहे। वह अंतरिक्ष विज्ञान के प्रचार-प्रसार और युवाओं को प्रेरित करने में सक्रिय हैं। उन्होंने एक बार सच ही कहा था "सितारों तक पहुँचने का सपना देखो, लेकिन पैर ज़मीन पर जमाए रखो।"
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 2 अप्रैल को मनाये जाने वाले “विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस” के बारे में:
विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस प्रतिवर्ष 2 अप्रैल को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 दिसंबर 2007 को इस दिवस को आधिकारिक मान्यता दी, जिसे 2008 से पहली बार मनाया गया। इस का उद्देश्य ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करना और समावेशी समाज का निर्माण करना था। ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्तियों को अक्सर सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण उन्हें शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में अवसर प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
इस दिवस के महत्व को दर्शाने के लिए दुनिया भर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। नीले रंग को ऑटिज्म जागरूकता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस दिन प्रमुख इमारतों को नीली रोशनी से सजाया जाता है। स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक केंद्रों में जागरूकता कार्यक्रम, सेमिनार और वर्कशॉप आयोजित किए जाते हैं।
ऑटिज्म मानवीय विविधता का एक पहलू है। एक सहानुभूतिपूर्ण और समावेशी समाज का निर्माण करके हम ऑटिस्टिक व्यक्तियों की क्षमताओं को पहचान सकते हैं और उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल कर सकते हैं।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: "हार गया लेकिन खुद से जीत गया"
एक बार हरीश नाम का एक लड़का था जिसे मैराथन दौड़ दौड़ने का बहुत ही जुनून था। उसे दौड़ने का शौक तो बचपन से ही था, लेकिन एक समस्या थी—वह कभी भी कोई मैराथन पूरी नहीं कर पाता था। हर बार वह बीच में ही थककर छोड़ देता। एक दिन, उसने ठान लिया: "चाहे जो हो जाए, आज मैं इस रेस को पूरा करके ही रहूँगा!"
रेस शुरू हुई। हरीश ने पूरे जोश से दौड़ना शुरू किया, लेकिन कुछ ही देर में वह पिछड़ने लगा। उसके पैरों में दर्द हो रहा था, सांस फूल रही थी। वह रुक गया और हार मानने को हुआ। तभी उसके मन में एक विचार कौंधा: "अगर दौड़ नहीं सकता, तो चलकर तो पूरा कर सकता हूँ!"
वह धीरे-धीरे चलने लगा। कुछ देर बाद, उसके शरीर ने साथ देना बंद कर दिया—वह गिर पड़ा। लोगों ने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन हरीश ने इनकार कर दिया। "नहीं, आज मैं खुद ही फिनिश लाइन तक पहुँचूँगा!" उसने ज़िद पकड़ ली और लड़खड़ाते हुए फिर से आगे बढ़ा।
अंततः, वह फिनिश लाइन पार करने वाला आखिरी धावक था। भीड़ ने उसके लिए तालियाँ बजाईं। हरीश ज़मीन पर गिर गया—उसके पैरों में ऐंठन थी, शरीर पसीने से तर था, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी। वह जानता था कि आज वह हारा ज़रूर, लेकिन खुद पर जीत गया। पहली बार उसने मैराथन पूरी की थी!
यह कहानी हमें सिखाती है कि हार नहीं, हमारी कोशिश मायने रखती है। हरीश ने रेस नहीं जीती, लेकिन उसने अपनी कमज़ोरी पर जीत हासिल की। जीवन में कभी-कभी लक्ष्य से ज़्यादा महत्वपूर्ण वह संघर्ष होता है जो हम करते हैं। जब हम अपने डर, आलस्य या कमज़ोरियों को हराते हैं, तो यह सबसे बड़ी जीत होती है।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!
निर्माता : प्रेम वर्मा, PS बैजनाथपुर जमुनहा








