सुप्रभात बालमित्रों!
18 फ़रवरी – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 18 फ़रवरी है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है,
आपके हमसफ़र प्रेम वर्मा के साथ, आज की रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर
एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे,
और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
"स्वयं पर मूक विजय से ही वास्तविक महानता का उदय होता है।"
"Real glory springs from the silent conquest of ourselves."
यह कथन हमें बताता है कि सच्ची महानता स्वयं के भीतर की लड़ाई जीतने से उत्पन्न होती है। जब हम अपने विचारों, भावनाओं और कार्यों को नियंत्रित करना सीखते हैं, तभी हम वास्तव में महान बन पाते हैं।
यह आंतरिक विजय सबसे कठिन और सबसे अधिक पुरस्कृत यात्रा होती है। इसे साधने से ही हमें वास्तविक संतुष्टि और सम्मान प्राप्त होता है। यह एक कठिन और लंबी प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इसके परिणाम बहुत ही सुखद और संतोषजनक होते हैं – इसलिए हमें रोज़ थोड़ा-थोड़ा खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द, जो है: INSCRIPTION : शिलालेख
Inscription या शिलालेख एक पत्थर या किसी कठोर सतह पर उकेरे गए या खुदे हुए लेख को कहते हैं, जो आमतौर पर ऐतिहासिक, धार्मिक या स्मारकीय महत्व के होते हैं।
उदाहरण वाक्य:
हिंदी: "अजन्ता की गुफाओं में अनेक महत्वपूर्ण शिलालेख पाए जाते हैं।"
English: "Many important inscriptions are found in the caves of Ajanta."
खाते खाते गाना गाए, पेट नहीं उसका भर पाए।
जवाब : चकिया (चक्की)
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 18 फ़रवरी की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1745: इतालवी रसायनज्ञ और भौतिक विज्ञानी एलेसेंड्रो वोल्टा का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया का पहला स्थैतिक बिजली जनरेटर वोल्टेइक पाइल का आविष्कार किया। इसी वजह से आज के दिन को अंतर्राष्ट्रीय बैटरी दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
- 1836: महान संत एवं विचारक रामकृष्ण परमहंस का जन्म हुआ।
- 1905: पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में इंडियन होम रूल सोसाइटी की स्थापना की, जो ब्रिटिश भारत में स्व-शासन के लिए बनाई गई थी।
- 1911: भारत में विमान से पहली बार डाक पहुँचाने का काम हुआ। 10 कि.मी. की इस उड़ान में 6500 पत्र इलाहाबाद से नैनी ले जाए गए।
- 1930: अमेरिकी खगोलशास्त्री क्लाइड टॉमबाग ने बौने ग्रह प्लूटो की खोज की। यह खोज एरिजोना के लोवेल वेधशाला में हुई थी।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी में आज हम जानेंगे “रामकृष्ण परमहंस” के बारे में।
रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत, विचारक और आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने सभी धर्मों की एकता पर बल दिया और ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति के मार्ग को प्रशस्त किया। उनका जन्म 18 फरवरी, 1836 को बंगाल के हुगली जिले के कमरपुकुर गांव में हुआ था। उनका असली नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था, लेकिन लोग उन्हें प्रेम से रामकृष्ण कहते थे।
बचपन से ही उनके मन में ईश्वर के प्रति गहरी आस्था और प्रेम था। उन्होंने विभिन्न धार्मिक प्रथाओं का अभ्यास किया और यह अनुभव किया कि सभी धर्म ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग रास्ते हैं। वे काली माता के मंदिर में पुजारी भी रहे, जहाँ उन्होंने माँ काली के दिव्य दर्शन का अनुभव किया।
रामकृष्ण परमहंस ने अपने शिष्यों को भक्ति, ज्ञान और कर्म के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग दिखाया। उनके प्रमुख शिष्यों में स्वामी विवेकानंद, माँ शारदा देवी और रामकृष्णानंद शामिल हैं। उनके विचारों और प्रेरणा से आगे चलकर रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई, जो आज भी विश्व भर में सेवा और आध्यात्मिकता का संदेश दे रहे हैं।
16 अगस्त, 1886 को गले के कैंसर के कारण उनका महाप्रयाण हो गया। उनके शिष्यों ने उनके संदेश – "जियो और दूसरों की सेवा करो, हर जीव में ईश्वर का दर्शन करो" – को दुनिया भर में फैलाया। रामकृष्ण परमहंस के विचार आज भी लोगों को ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।
अभ्युदय वाणी दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 18 फ़रवरी को मनाये जाने वाले “अंतर्राष्ट्रीय बैटरी दिवस” के बारे में।
अंतर्राष्ट्रीय बैटरी दिवस हर साल 18 फरवरी को मनाया जाता है। यह दिन एलेसेंड्रो वोल्टा के जन्मदिन के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने 1801 में पहली वास्तविक बैटरी का आविष्कार किया था। उन्होंने दुनिया का पहला स्थैतिक बिजली जनरेटर वोल्टेइक पाइल बनाया।
वोल्टा ने बताया कि विभिन्न धातुओं के बीच संपर्क से विद्युत धारा उत्पन्न होती है। उनके सैद्धांतिक और प्रायोगिक कार्यों के परिणामस्वरूप पहली बैटरी का निर्माण हुआ, जिसने पहली बार विद्युत धारा का एक स्थायी स्रोत उपलब्ध कराया।
बाद में 1859 में फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी गैस्टन प्लांटे ने दुनिया की पहली रिचार्जेबल लेड-एसिड बैटरी का आविष्कार किया, जो आज भी उपयोग की जाती है। 1970 के दशक में ब्रिटिश-अमेरिकी रसायनज्ञ माइकल स्टेनली व्हिटिंगम ने पहली रिचार्जेबल लिथियम-आयन बैटरी विकसित की, जिसका उपयोग अब मोबाइल फोन सहित अनेक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में होता है।
बैटरी एक ऐसा उपकरण है जो रासायनिक ऊर्जा को संग्रहीत करती है और उसे वोल्टेज के रूप में विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है, जिससे विद्युत प्रवाह होता है। इसमें दो धातु की प्लेटें होती हैं – एक धनात्मक (कैथोड) और एक ऋणात्मक (एनोड), जो एक रासायनिक घोल (इलेक्ट्रोलाइट) में डूबी होती हैं। इनके बीच होने वाली रासायनिक क्रिया से विद्युत आवेश का प्रवाह होता है, जो हमें उपयोगी विद्युत ऊर्जा प्रदान करता है।
एलेसेंड्रो वोल्टा के सम्मान में 1881 में विद्युत क्षमता और विद्युत चालक बल की इकाई के लिए "वोल्ट (Volt)" नाम को आधिकारिक रूप से अपनाया गया। आज की आधुनिक दुनिया – मोबाइल, लैपटॉप, टॉर्च, कार, सैटेलाइट – सब बैटरियों पर निर्भर हैं, इसलिए यह दिन हमें वैज्ञानिकों के योगदान और ऊर्जा के समझदारी से उपयोग की याद दिलाता है।
अभ्युदय वाणी के अंतिम पड़ाव पर अब सुनते हैं आज की प्रेरणादायक बाल कहानी, जिसका शीर्षक है: “सबकी चहेती मंजू”
एक बार की बात है, एक गाँव में मंजू नाम की लड़की रहती थी। वह सुबह सूरज की पहली किरण के साथ अपनी आँखें खोलती थी। चिड़ियों की चहचहाट और हवा की सरसराहट उसे एक नई ऊर्जा से भर देती थी। वह घर में सभी बड़ों को आदर से प्रणाम करती और एक मीठी मुस्कान बिखेरती। मंजू की मुस्कान में एक खास जादू था, जो सबके चेहरे पर खुशी ला देता था।
पाठशाला जाने से पहले, मंजू अपनी माँ के साथ मिलकर सबके लिए स्वादिष्ट नाश्ता तैयार करती। वह नाश्ते में मदद करती और उसके बाद अपनी दादी के पास कहानियाँ सुनने जाती। दादी की कहानियों में खोकर वह कुछ समय के लिए अपनी किताबों को भूल जाती, लेकिन जब पढ़ने बैठती तो पूरे मन से पढ़ती।
पाठ याद करने के लिए मंजू सिर्फ रटने के बजाय, उसे समझती, उस पर सोचती और अपने दोस्तों के साथ चर्चा करती। इस तरह, उसे पाठ आसानी से याद हो जाता और वह उसे कभी नहीं भूलती थी।
खाना खाने के बाद मंजू पाठशाला के लिए निकल पड़ती। वहाँ भी वह सबके साथ मिलजुलकर रहती और हर काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती। मंजू को हर विषय में अच्छे अंक मिलते, क्योंकि वह हर चीज को समझकर, रुचि के साथ सीखती और अपने ज्ञान को दूसरों के साथ बाँटती थी।
मंजू सबकी चहेती केवल इसलिए नहीं थी कि वह अच्छे अंक लाती थी, बल्कि इसलिए कि वह सबके साथ प्यार से बात करती, सबकी मदद करती और हमेशा मुस्कुराती रहती थी। उसकी सादगी, विनम्रता और सच्चे दिल की वजह से लोग उसे बहुत पसंद करते थे।
सीख: मंजू की कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची सफलता और खुशी केवल अंकों से नहीं, बल्कि अच्छे व्यवहार, सहयोग, प्रेम और मुस्कान से मिलती है। जब हम खुद सीखते हैं और दूसरों की मदद करते हैं, तभी हम सबके चहेते बनते हैं और जीवन का असली आनंद पा सकते हैं।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







