सुप्रभात बालमित्रों!
15 सितम्बर – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 15 सितम्बर है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है,
आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में,
जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
जीवन की सार्थकता दूसरों के लिए जीने से है।
A life lived for others is a life worthwhile.
इस दृष्टिकोण के अनुसार, व्यक्ति का जीवन तब सार्थक होता है जब वह समाज के कल्याण के लिए कार्य करता है। दूसरों की सेवा करके, हम न केवल समाज को बेहतर बनाते हैं, बल्कि स्वयं को भी संतुष्टि और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। दूसरों की सेवा करने से व्यक्ति में करुणा, सहानुभूति और दया जैसे सद्गुण विकसित होते हैं। यह व्यक्ति को एक बेहतर इंसान बनाता है। इतिहास में कई ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने दूसरों के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। महात्मा गांधी, मदर टेरेसा और अंबेडकर जैसे नेता इस बात के प्रमाण हैं कि दूसरों के लिए जीने से जीवन को एक नया आयाम मिल सकता है।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है: CERTAIN: सर्टन : पक्का, निश्चित या पूर्णतया आश्वस्त। "सर्टन" का प्रयोग आमतौर पर किसी बात की पुष्टि करने या किसी बात के बारे में निश्चित होने के लिए किया जाता है।
वाक्य प्रयोग: It is certain that hard work leads to success. यह पक्का है कि मेहनत से ही सफलता मिलती है।
उत्तर - खिड़की से।
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 15 सितम्बर की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 1835: चार्ल्स डार्विन HMS Beagle पर गैलापागोस द्वीप समूह में पहुंचे। उनकी इस यात्रा ने प्रजातियों की उत्पत्ति और विकासवाद के सिद्धांत को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 1861: भारत के महान इंजीनियर और भारत रत्न प्राप्तकर्ता सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म हुआ। उनके सम्मान में भारत में 15 सितंबर को इंजीनियर्स डे मनाया जाता है।
- 1876: बंगाली साहित्य के महान रचनाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म हुआ। उनकी रचनाएँ जैसे 'देवदास', 'बिराज बहू', 'पथेर पांचाली', और 'श्रीकांत' ने मानवीय मूल्यों और ग्रामीण भारत को उजागर किया।
- 1916: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सोम्मे की लड़ाई में ब्रिटिश सेना ने पहली बार टैंकों का उपयोग किया, जिसने युद्ध की रणनीति को बदला।
- 1927: प्रसिद्ध हिंदी कवि, नाटककार और स्वतंत्रता सेनानी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म बस्ती, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनकी रचना "खूँटियों पर टंगे लोग" सामाजिक जागरूकता के लिए प्रसिद्ध है।
- 15 सितंबर 1959 को नई दिल्ली में यूनेस्को की सहायता से दूरदर्शन का प्रयोगात्मक प्रसारण शुरू हुआ, जो भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम था।
- 1971: वैंकूवर, कनाडा में ग्रीनपीस की स्थापना हुई। ग्रीनपीस (Greenpeace) (शाब्दिक अर्थ - हरित शान्ति) पर्यावरण चेतना का विश्वव्यापी आन्दोलन है।
- 2007: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस के रूप में घोषित किया, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देता है।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “महान उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय” के बारे में।
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय भारतीय साहित्य के महान नायक और उपन्यासकार थे। उनका जन्म 9 सितंबर 1876 को बंगाल के देबग्राम गाँव में हुआ था। वे अपने समय के समाज, संस्कृति और मानवीय भावनाओं को अपने लेखन में बड़ी सजीवता से प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं।
शरतचंद्र ने सामाजिक बंधनों, परिवार और महिलाओं की स्थिति जैसे विषयों को अपने उपन्यासों में प्रभावशाली ढंग से उठाया। उनके प्रमुख उपन्यासों में ‘देवदास’, ‘पलाशीर परीक्षित’, ‘श्रीकांत’ और ‘चरित्रहीन’ शामिल हैं। उन्होंने सरल और भावपूर्ण भाषा में मानवीय संवेदनाओं को प्रस्तुत किया, जिससे पाठक उनकी कहानियों में आसानी से डूब जाते हैं।
उनका लेखन न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि समाज के कई पहलुओं पर सोचने और संवेदनशील बनने की प्रेरणा भी देता है। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का निधन 16 जनवरी 1938 को हुआ, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी भारतीय साहित्य में अमर हैं।
सारांश: शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने समाज और मानव मन के विविध पहलुओं को अपनी रचनाओं में व्यक्त कर भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। उनका साहित्य आज भी पाठकों के लिए प्रेरणा और शिक्षा का स्रोत है।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 15 सितम्बर को मनाये जाने वाले “अभियंता दिवस” के बारे में:
भारत में हर वर्ष 15 सितंबर को अभियंता दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के महान अभियंता और भारत रत्न से सम्मानित सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जन्मदिन की स्मृति में मनाया जाता है।
सर एम. विश्वेश्वरैया एक विश्व-प्रसिद्ध सिविल इंजीनियर थे। वे सिंचाई डिजाइन के महारथी माने जाते हैं। बांध निर्माण, शहरी नियोजन और सिंचाई व्यवस्था में उनका योगदान अद्वितीय रहा है। उनकी सबसे प्रसिद्ध परियोजना कृष्णा राजा सागर बांध और झील है, जिसने दक्षिण भारत की कृषि व्यवस्था को बहुत लाभ पहुँचाया।
अभियंता दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उत्कृष्टता को बढ़ावा देना और युवाओं को इस दिशा में प्रेरित करना है। इस दिन विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेजों, संस्थानों और संगठनों में सेमिनार, कार्यशालाएँ और प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाती हैं।
यह दिवस हमें याद दिलाता है कि इंजीनियर समाज के विकास और प्रगति के निर्माता होते हैं। सड़कों, पुलों, बांधों से लेकर आधुनिक तकनीक तक—हर जगह अभियंताओं का योगदान हमारी जिंदगी को आसान और बेहतर बनाता है।
एक गाँव में एक बहुत धनी आदमी रहता था। उसका एक बेटा था, लेकिन उसमें कई बुरी आदतें थीं। पिता उसे बार-बार समझाते, "बेटा, बुरी आदतें छोड़ दो।" पर बेटा हर बार कहता, "अभी तो मैं छोटा हूँ, जब बड़ा हो जाऊँगा तब छोड़ दूँगा।"
पिता उसके जवाब से चिंतित रहते थे। एक दिन उन्होंने बेटे को समझाने का उपाय सोचा। वे उसे अपने साथ बगीचे में ले गए।
सबसे पहले उन्होंने एक छोटे पौधे की ओर इशारा किया और बोले, "बेटा, इसे उखाड़कर फेंक दो।" बेटे ने बिना देर किए पौधे को उखाड़ दिया। थोड़ा आगे बढ़कर पिता ने एक झाड़ी दिखाई और कहा, "इसे भी उखाड़ो।" बेटे ने थोड़ी मेहनत की, पर झाड़ी भी उखाड़ दी।
अब वे और आगे गए। वहाँ एक बड़ा और मजबूत पेड़ था। पिता ने कहा, "अब इस पेड़ को भी उखाड़कर दिखाओ।" बेटे ने बहुत कोशिश की, पर पेड़ अपनी जड़ों में मजबूती से जमा था। उसे हिला भी नहीं सका।
पिता ने मुस्कुराते हुए कहा, "देखो बेटा, छोटे पौधे और झाड़ी को तो तुमने आसानी से उखाड़ दिया, लेकिन यह बड़ा पेड़ तुम्हारे बस की बात नहीं है। बुरी आदतें भी ठीक इसी तरह होती हैं। जब वे नई और छोटी होती हैं, तो आसानी से छोड़ी जा सकती हैं। लेकिन अगर उन्हें बढ़ने दिया जाए, तो वे गहरी जड़ें जमा लेती हैं और फिर उनसे छुटकारा पाना बहुत कठिन हो जाता है।"
बेटे की आँखें खुल गईं। उसने तुरंत प्रण लिया कि वह अपनी बुरी आदतें छोड़कर एक अच्छा इंसान बनेगा। यह कहानी हमें सिखाती है कि बुरी आदतें जितनी जल्दी छोड़ी जाएँ, उतना ही अच्छा है। वरना वे जड़ें पकड़ लेती हैं और जीवन को कठिन बना देती हैं।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में। आपका दिन शुभ हो!







