सुप्रभात बालमित्रों!
13 जून – प्रेरणादायक ज्ञान यात्रा
सुप्रभात बालमित्रों!
आज 13 जून है, और अभ्युदय वाणी की रेलगाड़ी एक बार फिर से आपको ले चलने के लिए तैयार है, आज के रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक अद्भुत यात्रा में, जहाँ हम नए विचारों से प्रेरित होंगे, नई जानकारी हासिल करेंगे, और जीवन के मूल्यों को समझेंगे।
तो, आइए, इस सफर की शुरुआत करते हैं, आज के प्रेरणादायक सुविचार से:
"जब लोग तारीफ करें तो उसमें झूठ खोजिए, अगर आलोचना करें तो उसमें सच की तलाश कीजिए।"
"When people praise you, look for the falsehood in it; if they criticize you, search for the truth in it."
यह कथन हमें सिखाता है कि तारीफों को नम्रता से स्वीकार करना चाहिए और उनमें सच्चाई की तलाश करनी चाहिए, जबकि आलोचना को खुले दिमाग से सुनना चाहिए और उससे सीखने का प्रयास करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक प्रशंसा करता है, तो यह संभव है कि वे आपसे कुछ हासिल करने की कोशिश कर रहे हों या आपकी चापलूसी कर रहे हों। प्रशंसा को स्वीकार करते समय, अपनी खूबियों और कमियों का यथार्थवादी मूल्यांकन करें। तारीफों से घमंडी न बनें। वहीं आलोचना को व्यक्तिगत रूप से न लें। इसे अपनी कमियों को सुधारने और खुद को बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखें। आलोचना करने वाले व्यक्ति का इरादा और उनकी योग्यता का मूल्यांकन करें। आलोचना में मौजूद सकारात्मक पहलुओं को ढूंढें और उनसे सीखें।
अभ्युदयवाणी में अब जानते हैं आज का अंग्रेजी शब्द जो है:
Forgiveness: क्षमा या माफ़ी। यह किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध या गलती को भुला देना और उसके प्रति क्रोध या द्वेष का भाव खत्म कर देना होता है।
वाक्य प्रयोग : Forgiveness is a virtue that empowers us to let go of others' mistakes.
क्षमा एक ऐसा गुण है जो हमें दूसरों की गलतियों को माफ करने की शक्ति देता है।
उत्तर - नक्शा
अब अगला स्टेशन है आज का इतिहास: इतिहास हमें अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने का मौका देता है। आइए इतिहास के पन्नों में आज 13 जून की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालें।
- 13 जून 1290 को जलालुद्दीन फिरोज़ ख़िलजी ने दिल्ली की गद्दी संभाली, जिससे गुलाम वंश का अंत हुआ और ख़िलजी वंश की स्थापना हुई। उनका शासन 1290 से 1296 तक चला।
- 1898 में पेरिस में पहली बार महिला सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जो आधुनिक सौंदर्य प्रतियोगिताओं की शुरुआत मानी जाती है।
- 31 जुलाई 1940 को महान भारतीय क्रांतिकारी ऊधम सिंह को लंदन के पेंटनविल जेल में फांसी दी गई। उन पर 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए जिम्मेदार पंजाब के गवर्नर जनरल ओ'डायर की हत्या का आरोप था, जिसे उन्होंने बदले के लिए अंजाम दिया।
- 26 जुलाई 1956 को मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किया, जो पहले ब्रिटिश और फ्रांसीसी स्वामित्व में थी। यह निर्णय स्वेज संकट की शुरुआत बना।
- 1966 में धीरूभाई अंबानी ने रिलायंस टेक्सटाइल्स नामक कंपनी की स्थापना की, जो बाद में रिलायंस इंडस्ट्रीज के रूप में विकसित हुई।
- डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय ने 1978 में भारत के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी प्रोजेक्ट की शुरुआत की, जिसके तहत 1978 में कनुप्रिया अग्रवाल उर्फ़ दुर्गा का जन्म हुआ।
- किरण बेदी को 2003 में संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना विभाग में नागरिक पुलिस सलाहकार नियुक्त किया गया। वह इस पद पर नियुक्त होने वाली पहली महिला थीं।
अभ्युदय वाणी की अगली कड़ी प्रेरक व्यक्तित्व में आज हम जानेंगे “धीरूभाई अंबानी” के बारे में।
धीरूभाई अंबानी, जिनका पूरा नाम धीरजलाल हीराचंद अंबानी था, का जन्म 28 दिसंबर, 1932 को गुजरात के चोरवाड गांव में एक साधारण परिवार में हुआ। एक स्कूल शिक्षक के बेटे, धीरूभाई ने कम उम्र में ही व्यवसाय की दुनिया में कदम रखा। 16 साल की उम्र में वे यमन चले गए, जहां उन्होंने एक पेट्रोल पंप पर क्लर्क की नौकरी की और बाद में एक ट्रेडिंग फर्म में काम किया। वहां उन्होंने व्यापार, निर्यात, और बाजार की बारीकियां सीखीं।
1958 में भारत लौटने के बाद, धीरूभाई ने अपनी उद्यमशीलता की शुरुआत की। उन्होंने अपने चचेरे भाई चंपकलाल दमानी के साथ मिलकर "रिलायंस कॉमर्शियल कॉर्पोरेशन" की नींव रखी, जो शुरू में मसालों और पॉलिएस्टर धागे के व्यापार पर केंद्रित थी। 1966 में, उन्होंने अहमदाबाद में एक कपड़ा मिल शुरू की और "विमल" ब्रांड लॉन्च किया, जो जल्द ही भारत में लोकप्रिय हो गया। उनकी दूरदर्शिता, नवीन सोच, और जोखिम लेने की क्षमता ने रिलायंस को कपड़ा, पेट्रोकेमिकल्स, तेल शोधन, और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में एक विशाल साम्राज्य बना दिया।
धीरूभाई अंबानी ने 1977 में रिलायंस इंडस्ट्रीज को शेयर बाजार में सूचीबद्ध किया और आम निवेशकों को कंपनी में हिस्सेदारी का अवसर दिया, जिससे लाखों भारतीयों का भरोसा और पूंजी जुटाई। उनकी सोच— "सपने देखो, बड़े सपने देखो" — ने उन्हें भारत के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में से एक बनाया। 6 जुलाई, 2002 को 69 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत रिलायंस इंडस्ट्रीज के जरिए आज भी जारी है, जिसे उनके बेटों मुकेश और अनिल अंबानी ने आगे बढ़ाया।
धीरूभाई अंबानी की कहानी कठिन परिश्रम, दृढ़ संकल्प, और नवाचार की मिसाल है। वे इस बात का प्रतीक हैं कि सीमित संसाधनों और साधारण पृष्ठभूमि से भी, साहस और समझदारी से विश्वस्तरीय सफलता हासिल की जा सकती है।
अभ्युदय वाणी के दैनिक विशेष में अब हम जानेंगे 13 जून को मनाये जाने वाले "अंतर्राष्ट्रीय एल्बिनिज़्म जागरूकता दिवस" के बारे में:
अंतर्राष्ट्रीय एल्बिनिज़्म जागरूकता दिवस हर वर्ष 13 जून को मनाया जाता है। इसकी घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2014 में की थी और इसे पहली बार 2015 में वैश्विक स्तर पर मनाया गया। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य एल्बिनिज़्म से पीड़ित लोगों के अधिकारों की रक्षा करना, उनके प्रति समाज में जागरूकता फैलाना और भेदभाव व हिंसा को रोकना है।
एल्बिनिज़्म यानी रंगहीनता एक वंशानुगत रोग है जिसमें व्यक्ति के शरीर में मेलानिन नामक रंजक की कमी होती है, जिससे उसकी त्वचा, बाल और आंखों का रंग बहुत हल्का होता है। इस स्थिति से पीड़ित लोगों को अक्सर दृष्टि संबंधी समस्याएँ भी होती हैं। कई देशों, विशेषकर अफ्रीका में, एल्बिनिज़्म से ग्रसित लोगों को अंधविश्वास और मिथकों के कारण सामाजिक बहिष्कार, उत्पीड़न और यहां तक कि शारीरिक हमलों का सामना करना पड़ता है।
इस दिन के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि एल्बिनिज़्म कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक जैविक स्थिति है। ऐसे लोगों को भी समाज में समान सम्मान, अवसर और सुरक्षा मिलनी चाहिए। हमें एक समावेशी और संवेदनशील समाज की ओर कदम बढ़ाना चाहिए, जहाँ हर व्यक्ति को बिना भेदभाव के जीने का अधिकार हो।
गर्मियों की एक सुबह, घने जंगल के बीच, दो घनिष्ठ मित्र, तोताराम और लल्लू, टहलते हुए प्रकृति के सौंदर्य का आनंद ले रहे थे। अचानक, उन्हें दूर से एक मधुर कुहुक सुनाई दी। यह कोयल की मधुर आवाज थी, जो जंगल में गूंज रही थी।
तोताराम, जो थोड़ा अंधविश्वासी था, बोला, "यह निश्चित रूप से कोई शुभ संकेत है! कोयल की मधुर आवाज सुबह-सुबह सुनना, इसका मतलब है कि आज का दिन मेरे लिए बहुत भाग्यशाली होगा। मुझे यकीन है कि मुझे आज कोई बड़ा खजाना मिलेगा!"
लल्लू, जो तोताराम से भी अधिक अंधविश्वासी था, तुरंत बोला, "नहीं-नहीं दोस्त, यह शुभ संकेत मेरे लिए है! मुझे विश्वास है कि आज मुझे कोई बड़ी रकम प्राप्त होगी।"
इस प्रकार, दोनों मित्रों के बीच कोयल की मधुर आवाज को लेकर बहस शुरू हो गई। वे एक दूसरे की बातों को काटने लगे और धीरे-धीरे बहस हाथापाई में बदल गई। थोड़ी ही देर में, वे दोनों बुरी तरह घायल हो गए।
दर्द से कराहते हुए, वे किसी तरह पास के गांव में पहुंचे और डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने उनकी चोटों का इलाज किया और पूछा कि वे इस हालत में कैसे पहुंचे।
दोनों ने सारी घटना डॉक्टर को बताई। यह सुनकर डॉक्टर हँसने लगे और बोले, "अरे बेवकूफों! यह कोयल की मधुर आवाज न तो तुम्हारे लिए थी और न ही किसी और के लिए। यह तो बस प्रकृति की सुंदरता का एक हिस्सा थी। तुम दोनों ने अपनी मूर्खता और लालच में न केवल एक-दूसरे को चोट पहुंचाई, बल्कि मेरा भी समय बर्बाद किया। अब, तुम्हें अपने इलाज के लिए मुझे मोटी रकम चुकानी होगी।"
यह सुनकर तोताराम और लल्लू, शर्मिंदा हो गए। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने डॉक्टर से माफी मांगी।
यह कहानी हमें बताती है कि बेकार के झगड़े और लालच से किसी को कोई लाभ नहीं होता। अंधविश्वास और लालच हमें गलत रास्ते पर ले जा सकते हैं। दोस्ती और आपसी समझदारी ही जीवन में सफलता और खुशी लाती है।
आज की अभ्युदय वाणी का सफ़र बस यहीं तक था, कल सुबह फिर मिलेंगे एक नई ऊर्जा के साथ रोमांचक, ज्ञानवर्धक और नैतिक शिक्षा से भरपूर एक रोचक सफ़र में।
आपका दिन शुभ हो!







